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कविता

तुम्हारे मनुष्य बनने तक
विमलेश त्रिपाठी


तुमने कभी सोचा नहीं था पाटनर
कि एक दिन पृथ्वी तुम्हारे मेज पर
ठहर जाएगी चलते-चलते
और तुम जब चाहे घुमा दोगे उसे इशारे से
नाचेगी ऊँगलियों पर वह
थम जाएगी तुम्हारे सोच लेने मात्र से

तुम्हारे सोचने का एक सिवान था
कि रुक जाता था माँ के अलताए पैरों
पिता की बुढ़ाई गहरी आँखों
और एक कजरारी लड़की की
मासूम खिलखिलाहट तक आकर

तब थक जाते थे तुम्हारे नन्हें-नन्हें पाँव
हरियर पगडंडियों से परियों के देश तक की यात्रा में
तुम्हारी अपेक्षा में खड़ी रहती थीं श्वेत परियाँ
बाँटने को वरदान तुम्हारे सूखते खेतों के लिए
और तब कितने मजे के दिन
और कितनी-कितनी खुशियों के दिन

सुबह कानों में फुसफसाती थी
बुतरू अमरूद का हाल
बाग में तुम और सपने में पौधे होते जवान
फलते थे ढेर के ढेर
और थक जाते तुम फल तोड़ते-खाते
अपने खिलन्दड़ दोस्तों के साथ

शामिल थे तुम लयबद्ध लहरों की उपासना में
तुम्हारे बस्ते में गढ़े गए मन्त्र
नदियों और पेड़ों की स्तुति के
दुहराते तुम डेढ़ा सवैया पौना की तरह

तब वह पृथ्वी माँ के आँचल में खेलती थी
बैठती थी किसान पिता के कान्धे पर
हरियाली पहनती थी लहरों पर तैरती थी
एक दुल्हन थी सोच में वह तुम्हारे
लाना था जिसे अपने आँगन पालकी में बैठाकर
पूरे दल-बल के साथ
एक दिन अपनी ही दुनिया में

तब नहीं सोचा था तुमने
कि समय लायेगा एक बवंडर
सूचना के राक्षस पहरेदार कई
चारों और मुस्तैद हो जायेंगे
और विशाल गाँव में
लहूलुहान निर्दोष पृथ्वी तुम्हारी
पड़ी होगी एक मेज पर अपराधी की तरह

परियाँ अन्धी और पौधों की शाखें कतर दी जायेंगी
असाध्य शून्य थरथराता ऊँगलियों के इशारे पर
और सपने कैद तुम्हारे
किसी तानाशाह के तिलस्मी महल में

तब सोचा नहीं था तुमने
कि तुम्हारे मनुष्य बनने तक यह दुनिया
मनुष्यता से खाली हो जाएगी
दौड़ेंगे लोहे के मनुष्य सड़क गली नुक्कड़ों पर
बरसायेंगे गोले
मासूम खिलौनों की शक्ल में
और विवश छटपटाते
अजीब सी बना दी गयी दुनिया में
तुम रह जाओगे अपनी स्मृतियों के साथ एकदम अकेले

तुम्हारे सोचने की सीमा यही थी पाटनर
कि नहीं सोचा था तुमने
किस क्षण तुम बन जाओगे
किसी खतरनाक मशीन का एक अदना सा पुर्जा
कि मनुष्य अकेले इस दुनिया में
किस क्षण तुम मनुष्य नहीं रह जाओगे...

 


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