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विमर्श

हिंदी का पुनर्जीवन (संदर्भ : लुप्त होती भाषाएँ)
अजित कुमार


'छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना मन' द्वारा हिन्दी कविता में अलग पहचान बनानेवाले स्व. गिरजाकुमार माथुर आकाशवाणी के सम्मानित अधिकारी होने के अलावा उस ऐतिहासिक संकलन 'तार सप्तक के सहयोगी कवि भी थे, जिसमें सम्मिलित प्रत्येक कवि को उसके किसी विशेष काव्यगुण के नाते अपनी पीढ़ी का अन्यतम कवि माना जा सकता है । गिरिजा कुमार की वह निजता थी- माधुर्य, लालित्य, आवेग, मांसलता और पारदर्शिता -जिसका एक अन्य उदाहरण है- ''नदी किनारे गाँव हमारा , आधी रात नाव ले आना.. पतला-पतला चाँद खिला हो, दूर कहीं ज्यों दीप जला हो.. पास एक सूना झुरमुट है, जल्दी में तुम भूल न जाना ।''

लेकिन श्री माथुर एक जगह टिक या ठहर जानेवाले कवि न थे । स्थानीय रंगत से भरपूर अपनी लंबी कविता 'दियाधरी' के बाद उनका ध्यान आधुनिक प्रौद्योगिकी की ओर गया जिसके संस्पर्श से प्रदीर्घ रचना 'पृथ्वीकल्प' संभव हुई । फिर, वे अकविता की शैली में रमते हुए, अन्तत: अपनी सुपरिचित ज़मीन पर लौटे जहाँ 'फिर उमड़े वही् मेघ, फिर आया याद प्यार' का आश्वासन था । इससे सिद्ध हुआ कि लम्बी यात्रा करते हुए भी अपने खुद के मुहावरे पर उनकी पकड़ कितनी पुख्ता थी ।

ऐसे विशिष्ट कवि-लेखक की स्मृति में व्याख्यान माला नियोजित करने के लिए आकाशवाणी को साधुवाद देते हुए मैं प्रस्तुत विषय- 'लुप्त होती भाषाओं के सन्दर्भ में हिन्दी का पुनर्जीवन' की चर्चा इस निवेदन से आरंभ करना चाहूँगा कि भाषा से सम्बद्ध अधिकांश वक्तव्य विवादग्रस्त और बहुधा संदिग्ध रहे हैं- यहाँ तक कि भाषा का आरंभ कैसे हुआ ?- भी ठीक-ठीक नहीं बताया जा सकता ।इतना भर अनुमान लगाया जा सकता है कि 'सम्प्रेषण' की स्वाभाविक आवश्यकता में से भाषा की उत्पत्ति हुई होगी ।

यह भी मानने-समझने में हर्ज नहीं कि सम्प्रेषण का जो भाषाई माध्यम आज अनेक श्रव्य-दृश्य-बहुविध माध्यमों के सहयोग से समूची दुनिया को एक छोटा-सा गाँव जैसा बना सका है, उसमें भी कई तरह की दिक्कतें बनी हुई हैं, जैसे कि कवि के शब्दों में, एक यह कि ''हम कहेंगे हाले-दिल और आप फ़रमाएँगे- क्या ?.. फिर यह भी कि जिस भाषा का प्राथमिक उद्देश्य यह समझा जाता है कि वह एक को सबसे जोड़ती है, कभी स्थिर नहीं रहती, निरन्तर बदलती चलती है- इस हद तक कि किसी भी व्यक्ति की भाषा सदा एक-सी नहीं हो सकती- शैशव से लेकर देहावसान तक लगातार बदलती चलती है... साथ ही, किन्हीं भी दो व्यक्तियों की भाषा बिलकुल एक-सी नहीं हो सकती- चाहे वे 'ट्विन्स' या हमशक्ल जुड़वाँ क्यों न हों ।

इसके निहितार्थ पर ग़ौर करें तो समझ में आ सकेगा कि 'भाषा' नामक जिस माध्यम का मुख्य उद्देश्य ही यह रहा होगा कि तमाम लोग आपस में जुड़ें और एक-दूसरे के निकट आएं, उसने काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर आदि कितने ही अन्य प्रयोजनों में फँसकर दुनिया के लोगों को मिलाने की जगह न केवल दूर-दूर रखा और भेदभाव किया बल्कि 'एस्परांटो' जैसी वह भव्य कल्पना भी साकार न होने दी जो 'समूची दुनिया में एक-ही भाषा' का प्रसार-विस्तार चाहती थी । इस स्थिति के निहितार्थों की चर्चा से पहले मैं 'भाषा की समझ' नामक अपनी एक पुरानी कविता का हवाला देना चाहूँगा-

भाषा की समझ

फ़र्क था बहुत

मेरी और उनकी बोली में ।

जब वे माँगते थे पानी

उठा लाता था मैं कपड़े।

जब मैं चाहता था एकान्त

सुलगा देते थे वे अँगीठी।

एक पुस्तक थी हमारे पास

जाने किस भाषा में लिखी,

जब हम साथ-साथ पढ़ते उसे-

मैं कहता-- - - -ज़ फ़ ग़ ट ह

वे- - - न म ल व र

उच्चारण ही क्यों,

अर्थग्रहण में भी

अन्तर था।

बावजूद इसके,

जब तक प्रेम था हमारे बीच

वह समझ में आता रहा।

फिर

विरक्ति को भी हम

धीरे-धीरे

समझने लगे ।

'लुप्त होती भाषाओं का सन्दर्भ' मुझे इसी बिन्दु पर प्रासंगिक जान पड़ता है- ''जब तक प्रेम था हमारे बीच/ वह समझ में आता रहा.. फिर विरक्ति को भी हम धीरे-धीरे समझने लगे '' क्योंकि भाषा का प्रसार होता है- प्रेम के नाते, चाहे वह अबोध शिशु के प्रति हो, चाहे कुत्ते-बिल्ली के प्रति… वे प्रेम की भाषा पहचानते और किलक कर या आंगिक मुद्रा द्वारा उसका प्रत्युत्तर देते है । इससे उलट है- विरक्ति, आक्रामकता, हवस, हड़प, बलात्कार, हिंसा या वह सब जो ताक़तवर को प्रेरित करता हो कि वह कमज़ोर को दबा उसपर काबिज़ हो जाए ।

यह नहीं कि महामारी, भुखमरी, भूकम्प आदि प्रकोपों के कारण आबादियाँ और उनकी भाषाएं पहले कभी नष्ट नहीं हुईं... बनने के क्रम में विभिन्न भाषाएँ शुरू से ही बढ़ती-सिकुड़ती-मिटती रही हैं और प्राकृतिक कारणों के अलावा लुटेरों, विजेताओं, तानाशाहों, उपनिवेशवादियों, साम्राज्यवादियों आदि के कारण भी विश्व की असंख्य भाषाएं लुप्त हुई हैं ..

लेकिन आज की दुनिया मे भाषाओं का लोप हिंसा, लूट-खसोट या प्रतिशोध के कारण उतना अधिक नहीं हो रहा, जितना भूमंडलीकरण या नव उपनिवेशीकरण या नव-पूँजीवाद या सम्प्रेषण-संचार साधनों की बहुतायत के कारण । फलत:, रेडिओ-टीवी-कम्प्यूटर-इन्टर्नेट की बढोतरी के सहारे औपनिवेशिक ताक़तों की तथाकथित बड़ी या आर्थिक स्तर पर समृद्ध भाषाएँ विशेषत: य़ूएनओ द्वारा मान्यताप्राप्त भाषाएँ- अंग्रेज़ी, फ्रांसीसी, स्पेनी, रूसी चीनी आदि तो विस्तृत होती रहीं, बहुतेरी सिकुड़ बल्कि सिमट गई हैं ।

'य़ूएनओ' के अंग- 'युनेस्को' अर्थात 'संयुक्तराष्ट्र शिक्षा, समाज, संस्कृति संगठन' के हालिया सर्वेक्षण से पता चला है कि भाषाओं के लुप्त होने की रफ्तार इधर तेज़ी से बढ़ चली है । अनुमान है कि दुनिया भर में इस वक़्त जो लगभग छ: या सात हज़ार भाषाएँ बाक़ी बची होंगी, उनमें से आधी ही क्यों, नब्बे प्रतिशत तक भाषाएँ इक्कीसवीं सदी के अन्त तक मिट जाएँगी ।

यह एक ऐसा खतरा है जिसे कुछ लोग तो स्वाभविक समझ अधिक चिन्ता नहीं करते; बल्कि सोचते हैं- अस्तित्व के संघर्ष में योग्यतम को ही बचना चाहिए; कमज़ोर को तो आगे-पीछे गिरना है ही; वह गिरे तो गिरे.. इस दृष्टिकोण की गूँज कवि के इस विचार में भी शायद मिले कि 'विकसते मुरझाने को फूल' या कि 'फूल को हम प्यार करें, पर यदि वह झरता है तो उसे झर जाने दें' लेकिन उतना ही वास्तविक यह अफ़सोस भी है कि- 'देखो, वह मुरझा गया फूल'.. जबकि जोश मलिहाबादी फूल की 'भंगुरता' को मनुष्य की रोती-बलखती दीर्घायु से अधिक मूल्यवान समझते हैं । उनकी रुबाई है- 'गुंचे, तेरी क़िस्मत पे दिल हिलता है ..बस एक तबस्सुम के लिए खिलता है.. गुंचे ने कहा कि इस दुनिया में, ऐ बाबा,, वह एक तबस्सुम भी किसे मिलता है !'

इन विचारों के क्रम में, एक विचार यह भी है कि 'भाषा' का लोप मात्र किसी एक 'इकाई' का मिटना भर नहीं; उसके साथ मानव समाज की बहुत कुछ सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार, लोकवार्ता, संगीत, नृत्य, कला, साहित्य, इतिहास, पुराण आदि-आदि इतना कुछ बहुमूल्य भी नष्ट हो जाता है, जो हर हाल में और जिस तरह भी संभव हो, रक्षित किया जाना चाहिए ।

इसी दृष्टिकोण से 'युनेस्को' ने विश्व की तमाम भाषाओं पर मँडराते खतरे को भाँपकर उन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा है- सेफ़, वल्नरेबिल और एनडैंजर्ड- अर्थात सुरक्षित, वेध्य और संकटग्रस्त । इसे थोड़ा स्पष्ट करें तो ज्ञात होगा कि सुरक्षित भाषाएँ वे हैं जिनके बच्चे, बड़े और बूढ़े दैनन्दिन जीवन में उनका यथा आवश्यक उपयोग निर्बाध रीति से करते हैं; जबकि वेध्य भाषाएँ वे हैं जिन्हे अधिकांश बच्चे घर में या विशेष अवसरों पर बोलते-समझते तो हैं पर जिन्हें वे घर के बाहर सामान्यत: नहीं बरतते ।

बचीं वे भाषाएँ जिनका अस्तित्व खतरे में है । ऐसी संकटापन्न भाषाओं की तीन श्रेणियाँ बनाई गई है- एक वे भाषाएँ जिन्हें बच्चे मातृभाषा की भाँति घर में नहीं बोलते-बरतते; ; दूसरी वे भाषाएँ, जिन्हें बूढ़े तो आपस में बोलते-बरतते हैं और बड़े भी समझ लेते हैं लेकिन जिनका उपयोग न माता-पिता आपस में करते हैं न अपने बच्चों को सिखाते हैं: तीसरी वे भाषाएँ जिन्हें केवल बूढे़ दादा-दादी या नाना-नानी भर बोलते हैं लेकिन वे भी आपसी व्यवहार में उसका उपयोग यदा-कदा ही और आंशिक रूप में करते हैं। खतरे में आई इन तीनों श्रेणियों की भाषाओं को क्रमश: डेफ़िनिटली एन्डैंजर्ड, सीवियरली एन्डैंजर्ड और क्रिटिकली एन्डैंजर्ड नाम दिए गए हैं, जिनके हिन्दी रूपान्तर कुछ इस तरह किए जा सकते हैं- निश्चय संकटग्रस्त, अतिशय संकटग्रस्त और भयानक संकटग्रस्त ।

इस सिलसिले में बताना ज़रूरी है कि युनेस्को-समेत विभिन्न सरकारें, भाषाविद, विश्वविद्यालय, संचार-माध्यम, कार्यकर्ता समूह और गूगुल जैसे संस्थान मिलकर तथा अलग-अलग भी लुप्त, मृत या मरणोन्मुख भाषाओं के पुनरुद्धार तथा संरक्षण-कार्य में संलग्न हैं और अपने उद्देश्य में किसी क़दर सफल भी हुए हैं । इस अभियान के महत्व, उपयोग और योगदान पर ध्यान दें तो मालूम होगा कि यह सिर्फ़ 'गड़े मुर्दे उखाडना' भर नहीं है; बल्कि अपनी बेशक़ीमती 'धरोहर' की आवश्यक साज-सँभाल है जो 'अनालोग' या 'डिजिटल' या 'माइक्रो-मैक्रो' आदि विविध उपायों-पद्धतियों से जुटाई जा रही है..

अनेक नृतत्वशास्त्रियों ने सुदूर जंगलों में बसी आदिम जनजातियों के बीच रह, उनके रीति-रिवाजों और विश्वासों का अध्ययन कर 'मिथकों' के इस पक्ष का उदघाटन किया है कि हमारे पुरखों ने जीवन के जो सत्य निरूपित किए और निष्कर्ष निकाले थे, उन्हें वे सदियों बाद आनेवाले अपने वंशजों के लिए मिथकों की कूट शैली में निबद्ध कर गए हैं । इस प्रक्रिया को समझाने के लिए लेवी स्ट्रास ने किसी भीड़भरे चौराहे का उदाहरण देते हुए बताया कि हमारा कोई हितू मानो उस बड़े-से चौराहे के एक ओर खड़ा है, जबकि हम उससे काफ़ी दूर, चौराहे के दूसरी ओर हैं और बीच में शोरभरा, भीड़भरा बेतरह यातायात है, जिसे चीरकर ही उस हितू का संदेश हम तक टुकड़ों-टुकडों में पहुँच पाता है.. उसे हम काफ़ी यत्न करने के बाद ही- आधी- अधूरी सुनी आवाज़ों को जोड़जाड़ कर उसके पूरेपन में समझ पाते हैं...यही हैं मिथक- यानी वे गूढ़ संदेश जो हमारे पुरखे अपने पीछे हमारे वास्ते छोड़ गए हैं ताकि हम अपना जीवन ठीक से चला सकें..

जहाँ तक भारतीय भाषाओं का संबंध है युनेस्को के सर्वेक्षण में, लगभग पौने दो सौ भाषाओं को 'खतरे' के दायरे में रखा गया है और उनकी सुरक्षा का आवाहन है । इस लंबी सूची में अंगिका, गढ़वाली, कुमाउँनी आदि हिन्दी से सम्बद्ध कतिपय वे भाषाएँ भी सम्मिलित हैं, जिन्हे लम्बे समय तक वृहद-विस्तृत हिन्दी क्षेत्र में मौजूद राजस्थानी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली, बघेली, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी आदि तथाकथित बोलियों के अन्तर्गत समझा जाता था लेकिन समय के प्रवाह में एक समय की 'बोलियां या 'उपभाषाएं भी स्वतन्त्र भाषाओं के रूप में अपनी हैसियत का दावा पेश करने लगी हैं, जिस पर 'पेरेन्ट' या 'केन्द्रीय' भाषा के पैरोकार नाक-भौं कितनी ही क्यों न सिकोड़ें.. लेकिन स्वाधीन देश की लोक- आकांक्षा का सम्मान तो अन्तत: करना ही होगा । ऐसी माँगों को दबाना, कुचलना या अनदेखना घातक ही नहीं आत्मप्रवंचनात्मक भी होगा ।

इस सिलसिले में उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में स्वीकृत राष्टीय भाषाओं की सूची तो-हमारे भाषिक राज्यों में उभरती जनाकाक्षाओं के कारण-- कभी-न-कभी बढेगी ही, फिलहाल केन्द्रीय साहित्य अकादमी ने राजस्थानी, मैथिली, डोगरी आदि को स्वतन्त्र भाषा की मान्यता दे दी है, और दिल्ली सरकार ने भी राजधानी में हिन्दी के अलावा पंजाबी-उर्दू-मैथिली-भोजपुरी की अकादमियाँ स्थापित की हैं, जिनमें संभव है आगे चलकर ब्रज, अवधी, मगही, हरियाणवी जैसी कुछ अन्य अकादमियाँ भी जोड़नी होंगी। बहरहाल, यह मसला लुप्त होती नहीं बल्कि विकसित हो रही भाषाओं का है इसलिए उचित होगा कि आधुनिक हिन्दी के उद्गम और विकास का तनिक हवाला देते हुए हम विषय के निकट रहें ।

सामान्यत: समझा जाता है कि पुरानी भाषा की केंचुल छोड़कर नई भाषा विकसित होती है । तो अनुमान लगाया गया कि एक लम्बी अवधि के दौरान, वैदिक संस्कृत में से क्रमश: लौकिक संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक उत्तर भारतीय भाषाओ का उदय हुआ होगा । प्रक्रिया यह रही होगी कि अल्पसंख्यक पढेलिखे शिष्टों की भाषा को अपदस्थ कर पहले तो बहुसंख्यक अनपढ गँवारों की भाषा प्रधान हुई.. फिर उन बहुसंख्यकों में से शिष्ट-शिक्षित वर्ग उभरा और यह क्रम सदियों तक चलता गया । खयाल है कि इसकी परिणति के रूप में अबसे लगभग हज़ार-बारह सौ साल पहले शौरसेनी अपभ्रंश में से पुरानी हिन्दी का उदय हुआ था ।

वीरगाथाकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल की लम्बी यात्रा तय करती जो हिन्दी ढेरों चुनौतियों से निपटती, आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पहुँची है, वह इस समय भले युनेस्को की 'सुरक्षित' भाषाओं वाली श्रेणी में आती हो, लेकिन विचारणीय यह है कि क्या इस सदी के अन्त तक भी उसकी यही हैसियत बनी रह सकेगी ? या कि हिन्दी भी उन छ:-सात हज़ार भाषाओं के लगभग नब्बे प्रतिशत का हिस्सा बनने को अभिशप्त मात्र एक मृतप्राय भाषा है ? क्या वह भी अपने जीवन के आखिरी चरण में है और क्या इक्कीसवीं सदी की समाप्ति पर उसे भी युनेस्को द्वारा लुप्त भाषा की श्रेणी में रखा जाएगा?

समूची दृढ़ता के साथ मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि नहीं, हमारी संघर्षशील भाषा जिस तरह अनेक बाधाओं का सामना करती हुई पिछले क़रीब हज़ार बरसों से लगातार चलती चली आ रही है, उसी तरह- यदि कोई आपदा ही न आ पड़े- तो भविष्य में भी वह न केवल बढ़ती जाएगी बल्कि ऊँचे-से-ऊँचे शिखरों को छुएगी । यह मात्र कपोलकल्पना नहीं, ठोस सचाई पर आधारित आकलन है । इसे स्पष्ट करने के लिए हिन्दी से जुड़े कुछ प्रवादों या भ्रमों को दूर करना ज़रूरी है।

सबसे पहले तो यही कि हिन्दी सिर्फ़ सौ- दो सौ साल पुरानी भाषा है । वैसा माननेवाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कथन 'हिन्दी नई चाल में ढली- सन 1873 ईस्वी' का या सन 1800 ईस्वी में वर्नाक्युलर शिक्षण के लिए खोले गए फोर्ट विलियम कालेज का हवाला देते हैं और सिद्धों-नाथों-वीरगाथाओं-कबीर-सूर-तुलसी-देव-बिहारी-मतिराम-रहीम-घनानन्द आदि की सुदीर्घ परम्परा को अनदेखा कर देते हैं जिसकी उपेक्षा का मतलब होगा- हिन्दी के अस्तित्व को ही नकार देना ... यही क्यों, तब तो कोई यह तक घोषित कर सकेगा कि इस राष्ट ने केवल 65-70 साल पहले सन 1947 में जन्म लिया- उससे पहले यह महज़ एक अनमेल गठजोड़ था । ऐसे तर्कों के उत्तर में इतना ही कहना काफ़ी होगा कि ''इस सादगी पे कौन न मर जाय, ऐ खुदा ! कि लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं ।''

हज़ार साल पुरानी हिन्दी का यह उदाहरण- ''भल्ला हुआ जु मारिया बहिणि महारा कंतु , लज्जेजं तु वयंसिअहु जए भग्गा घरु एंतु ।'' या पाँच-छ: सौ साल पहले के ''पाहन पूजे हरि मिलैं तो मैं पूजूँ पहाण' और 'मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो' यदि हिन्दी नहीं है तब तो 'बा बा ब्लैक शीप' या 'ट्विंकिल ट्विंकिल लिटिल स्टार' को ही हिन्दी कहना होगा या उसे नौकर-चाकर-चपरासी-चोबदार की ही भाषा मानते जाना होगा, जैसा कि हमारे गोरे हुक्मरान समझते थे और 'देरवाज़ अ कोल डे' या 'देरवाज़ अ बैंकर' से ही अपना काम चला लेते थे ।

वह प्रचलन स्वाधीन भारत में भी काले साहबों की बदौलत काफ़ी-कुछ बना हुआ है, जिसका पहला प्रमाण तो मुझे तब मिला, जब देखा कि एक युवा पूँजीपति की रोबदार जिज्ञासा ''कोई है !.'' सुन पाँच-छ: ताबेदार हाथ जोड़े इकठ्ठे हो गए थे और उसके बाद से लगातार भारत में अंग्रेज़ी का बढ़ता गया प्रभुत्व क़दम-क़दम पर इसकी याद दिलाता रह्ता है ... साथ-साथ ओंकारनाथ श्रीवास्तव की वह कविता भी याद आती है, जिसमें बताया गया था कि क़स्बे का नौजवान जब शहर से लौट सूट-बूट- टाई पहन गिट-पिट अंग्रेज़ी बोलने लगा तो उसके संगी-साथी भौचक रह गए थे.. फिर जब किसीने बीड़ी सुलगा उसे थमाई, तब जाकर साहबी लिबास में छिपा हुआ अपना 'चैतुवा' दिखा और सबकी जान-में-जान आई । जो भाषा या संस्कृति ऊपर से लादी जाए, उसकी परिणति अकसर यही होती हैं..निराला की प्रसिद्ध कविता 'कुकुरमुत्ता' में जब नवाब हुक्म देते हैं कि गुलाब उखाड़ समूचे बाग में कुकुरमुत्ता लगा दिया जाय तो 'बोला माली' फरमाएँ मआफ़ ख़ता- कुकुरमुत्ता अब उगाया नहीं उगता ।''

'कहीं की ईंट', कहीं का पत्थर ले टी.एस. इलियट ने दे मारा..पढ़ने वालों ने कहा दिल थाम- 'लिख दिया जहाँ सारा ' बतानेवाले ये वही निराला थे जिनसे इस व्याख्यान के केन्द्र-पुरुष श्री गिरिजाकुमार माथुर ने जब सन पचास के आसपास आकाशवाणी, इलाहाबाद के प्रभारी की हैसियत से रेडिओ पर काव्यपाठ का अनुरोध किया था तो स्थिति विषम हो गई थी । पहले तो उन्होंने फ़ीस के तौर पर हज़ार रुपयों की फर्माइश की, जबकि उन दिनों सामान्य अदायगी बीस रुपये हुआ करती थी । फिर जब श्री माथुर ने असमर्थता जताई तो वे बोले थे कि अब तो तुम दस हजार दोगे तो भी मैं नहीं आऊँगा ।' नतीजा यह निकला कि 'राम की शक्तिपूजा' के अद्भुत पाठकर्ता और शास्त्रीय गायन के भी परम विशेषज्ञ निराला की एक भी रिकार्डिंग आकाशवाणी के लेखागार में शायद नहीं है... और यदि किसी निजी स्रोत से उसे उपलब्ध किया जा सके तो वह अमूल्य धरोहर होगी ।

सच तो यह है कि सामाजिक-राजनीतिक वैषम्य के विरुद्ध हिन्दी का स्वाभिमान जतानेवाले उद्गार हिन्दी की जातीय चेतना को शुरू से रेखांकित करते आए हैं- ''हम चाकर रघुनाथ के पटौ लिख्यो दरबार, अब तुलसी का होंहिंगे नर के मनसबदार ।'' या 'सन्तन को कहा सीकरी सो काम.. आवत जात पनहिया टू्टीं, बिसरि गयो हरिनाम'' से लेकर भूषण, भारतेन्दु, मैथिलीशरण तक होते हुए आधुनिक युग ने भी हिन्दी की जुझारू और संघर्षशील परम्परा का पोषण किया है ।

लेकिन हिन्दी की स्वाभाविक मुद्रा लड़ाकू कभी नहीं रही- उस युग में भी नहीं जब वो हिन्दी बनाम उर्दू या 'अंग्रेज़ी हटाओ, हिन्दी लाओ' जैसे आन्दोलनों से गुज़री थी.. स्वाधीन भारत में उसकी उचित और न्यायसंगत भूमिका भी जब उसे नहीं सौंपी गई और कभी उसके 'साम्राज्यवादी' होने का तो कभी उसके 'अविकसित' होने का लांछन लगाया गया तब भी उसने धैर्य नहीं खोया.. यहाँ तक कि लम्बे समय तक जब उसे मात्र 'अनुवाद' की भाषा बनाए रखा गया और पारिभाषिक शब्दावली के प्रपंच में उलझाए रखा गया. तब भी वह अपनी सखियों-सहित अस्तित्व बचाने के उद्यम में संलग्न रही थी

रहा वह प्रश्न कि क्या हिन्दी भी 50 से लेकर 90 प्रतिशत तक की उन भाषाओं में से एक है जो इक्कीसवीं सदी के अन्त तक विलुप्त हो जाएँगी-? तो सीधा-सरल उत्तर है कि भाषिक स्तर पर हिन्दी की ताक़त घटने के बजाय दिनोंदिन बढ़ रही है इसके सिलसिले में उपलब्ध आंकड़े तो अविश्वसनीय इसलिए हैं क्योकि वे इसी कथन की पुष्टि करते हैं कि झूठ तीन तरह के होते हैं- एक -झूठ, दो- सफेद झूठ, और तीन- आँकड़े । चाहे जनसंख्या के नतीजे उठाएं, चाहे व्यावसायिक हानि-लाभ के ब्योरे, असलियत घोषणाओं से मेल खाती नहीं दिखेगी..

बड़े परदे पर दिखनेवाली हिन्दी फिल्में हफ्ते-दस दिन में ही सैकड़ों करोड़ का धन्धा कर लेती हैं.. छोटे परदे की हिन्दी चैनलों की संख्या अंग्रेज़ी चैनलों की तुलना में और हिन्दी कार्यक्रमों की टीआरपी अग्रेज़ी प्रोग्रामों की तुलना में अधिक गति से बढ़ रही है... हिन्दी में प्रसारित विज्ञापन अंग्रेज़ी में प्रसारित विज्ञापनों की तुलना में ज़्यादा देखे-पढ़े जाते हैं..यहाँ तक कि कोकाकोला, कालगेट, आदि विलायती उत्पादों का भी प्रचार अधिकतर हिन्दी के माध्यम से हो रहा है...चाकलेट जैसी परदेसी डेलीकेसी भी 'कुछ मीठा हो जाए के देसी अन्दाज़ में बेची जा रही है.. बर्गर तक में आलू-टिक्की भरी जाने लगी है और पीज़ा भी देसी ज़ायके के मुताबिक बनने लगा है.

बीस-पचीस साल पहले तक जिंगिल्स में अंग्रेजी की बहुतायत ने देसी-गँवई मुहावरों के लिए जगह खाली की है.. और तो और इन्टर्नेट पर भी हिंदी का प्रचलन तीव्र गति से बढ़ा है. विज्ञापन की दुनिया में हिन्दी कापी राइटरों की और फिल्मों के हिन्दी गीतकारों की आमदनियाँ खासी बढ़ी हैं.. और तो और, अंग्रे़ज़ी फिल्मों का भाषाई रूपान्तर या उनकी हिन्दी में डबिंग का अनुपात अच्छी गति से बढ़ा है.. इस सबके निहितार्थ की उपेक्षा नहीं की जा सकती, भले ही बही खातों में कच्चे-पक्के वाले घपले चलते जाने के कारण तमाम भाषाई माध्यम- प्रेस, चैनेल या प्रकाशक घाटा होने का रोना बदस्तूर रोते चले जा रहे हों..लेकिन खेलकूद के मैदानों मे विज्ञापनों-होर्डिंगों की भाषा का प्रतिशत हिन्दी-अंग्रेज़ी के बीच असंतुलित हो चुका है. इन सब तथ्यों पर निगाह डालना ज़रूरी होगा । माना कि जिसे 'गम्भीर विचार-विमर्श कहा जा सके, वह औपचारिक धरातल पर आज भी अंग्रेज़ी की ही जागीर है और हिन्दी की अखबारी टिप्पणियाँ भी दोयम दर्जे की मानी जाती है, लेकिन उनकी ज़मीनी पकड़ मज़बूत है । समूचे भारत में एक भी चुनावी प्रत्याशी खोजना मुश्किल होगा जो केवल अंग्रेज़ी के माध्यम से प्रचार अभियान चलाकर चुनाव जीत सका हो । अकेली हिन्दी ही नहीं, सभी भारतीय भाषाओं और उनकी अनगिनत बोलियों की जड़ें गहरे नीचे तक पहुंची हैं । इससे पता चलता है कि भाषिक आधार पर भारतीय राज्यों के पुनर्गठन का सिद्धान्त बुनियादी तौर पर सही और प्रभावी था । इस नाते शायद भाषा को इन्सान की पहली और आखिरी पहचान बताया जा सके । उस उक्ति में काफ़ी सचाई है कि ''जिसको अपने देश के उत्कर्ष का अभिमान नहीं, वह मनुज या पशु भी नहीं, मृतक के समान है ।'

इसे भुलाया नहीं जा सकता कि तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की अपनी भाषा 'बांगला' पर पश्चिमी पाकिस्तानी हुक्मरानों द्वारा थोपी गई 'उर्दू' के विरोध में जो स्वर आरम्भ में ही उठने लगे थे, उनकी उपेक्षा का ही परिणाम था कि अन्तत: वह इलाक़ा स्वतन्त्र हो गया । हिन्दी की वर्तमान शक्ति इसमें है कि वह विरोध या मुठभेड़ की मानसिकता से बहुत पहले उबर गई थी और 'हिन्दी बनाम उर्दू-अंग्रेज़ी', या 'हिन्दू बनाम मुसलमान' या हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान जैसी संकीर्णताओं को पीछे छोड़ छुआछूत के दकियानूसी रुख-रवैये से मुक्त हो चुकी है ।

यह आकस्मिक नहीं कि हिन्दी आज अंग्रेज़ी या उर्दू को अपने अस्तित्व के लिए खतरा नहीं समझती; उलटे उनके साथ स्वस्थ प्रतियोगिता बनाए रखने में यक़ीन करती है । आज़ादी के शुरुवाती दिनों में 'अंग्रेज़ी हटाओ, हिन्दी लाओ' के जो आन्दोलन बेहद स्वाभाविक प्रतीत होते थे, उनकी जगह 'सब साथ-साथ क़दम बढ़ाओ' की समझदारी धीरे-धीरे विकसित हुई है ।

इसके पीछे का परिपक्व सोच यह है कि 'अन्धी मुठभेड़' या 'बिना-विचारे भिड़ जाने' का परिणाम भुगत चुकने के बाद ही समझ में आता है कि सहयोग, स्वीकार और सत्कार की नीति उद्देश्यपूर्ति के लिए अधिक कारगर सिद्ध होती है । हिन्दी मुद्रण पुराने-धुराने लेटर प्रेस के ग़लत फांटों और टूटी मात्राओं का ज़माना पीछे छोड़ कंपूटर सेटिंग के साफ़-सुथरे युग में पहुँच ्गया है ... भारतीय ही नहीं, संसार भर की भाषाओं में सुलभ ज्ञान-विज्ञान के प्रति हिन्दी उन्मुख हुई है... यही नहीं, वह देश-विदेश के लेखन-चिन्तन का भरोसेमन्द 'क्लियरिंग हाउस' बन चली है-- वह संतोष तथा अभिमान का विषय है । इसे हिन्दी ने काफ़ी ठोकरें खाने और आटके रह जाने के बाद सीखा, पाया और बरता है । राष्ट्रीय 'चरखा गीत' की ये पंक्तियाँ- 'इसकी शान न जाने पाये, चाहे जान भले ही जाए' आज कुछ इस अर्थ में हिन्दी के लिए प्रासंगिक हुई है कि शान और जान का बचना अकसर समझदारी से भिड़ने और समस्या को स्थिरता से निबटाने पर निर्भर करता है ।

केसरिया बाना पहन रण में जूझते हुए प्राण गँवा देना हमेशा बहादुरी ही नही होता; आत्मघात भी हो सकता है- यह समझ हमारी भाषा को देर से आई, लेकिन दुरुस्त आई है- सब साथ-साथ बढें, एक-दूसरे की गर्दन काट शहीद न बनें, यह नई ताक़त आज हिदी को कायर या कातर होने से बचा रही है और विश्व की प्रमुख भाषाओं के बीच अपनी उचित जगह पाने के वास्ते तैयार करती है । बहुत कुछ को आसपास मिटते-मरते देख- 'जियो और जीने दो' का बुलन्द नारा हिन्दी को शक्ति-स्फूर्ति से सम्पन्न कर रहा है । आइए, उसके अभियान में सम्मिलित होइए ।


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