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कविता

लंकेश और घोड़े
रविकांत


बताओ! कि तुम मेरे दिमाग में
इतने वर्षों तक
लगभग कूदते हुए से पड़े रहे
और क्या बात है! कि तुम मुझे
बहुत प्यार कर-कर के
याद करते रहे

बिना किसी बात-चीत के
बिना एक-दूसरे के बारे में अधिक जाने
(हम सिर्फ एक-दूसरे को
कभी-कभी देखते ही तो थे)
समय के साथ-साथ
हम बहुत करीब होते गए

मैं अपनी बात कहूँ
(और तुम्हारी भी?)
तो मैं तुम्हें
किसी खरगोश के बच्चे-सा
कुलाँचेदार मानता था
और अपने को
किसी ऊदबिलाव की मूँछों-सा होशियार

लेकिन वाह रे वाह!
कि हम दोनों सहज दो दोस्त बन निकले
जैसे -
हेमंत और मिंडा
अजमल और हबड़े
ढोंड़ी और पेंदी
लंकेश और घोड़े

 


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