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कविता

यात्रा
रविकांत


मैं सो रहा था
मुझे लगा कि मैं जा रहा हूँ
जा रहा था तो
रास्ता लंबा लग रहा था

लंबे रास्ते में पड़ी एक झील
झील में उतरता हूँ मैं धीरे से छप्-छप् छप्-छप् गुप्प-गुप्प
पर यह क्या
आगे को सूखती जा रही है झील

भीगे तलवों से पार किया मैंने रेगिस्तान

पलट कर देखता हूँ
पीछे फिर एक झील है
सफेद पक्षियों से भरी
एकदम नई
झील के उस ओर बसा हुआ है स्वर्ग

मैं स्वर्ग की ओर लौटता हूँ
मुझे भय है कि स्वर्ग गायब होगा अभी
मैं छूता हूँ फाटक
स्वर्ग में मौजूद हैं स्त्रियाँ
उनसे आ रही है
उनके हरे-भरे होने की महक

देर तक वे स्त्रियाँ
मेरे साथ बातें करती हुई
हँसती खिलखिलाती रहीं
वे बिंदास और निर्द्वंद्व जान पड़ती थीं उस वक्त
फिर न जाने क्यों अचानक
उनकी आँखें
उदासी के फफोलों-सी रंगहीन होने लगीं

उन्होंने मेरे ऊपर से
अपने स्नेह-प्रश्नों के घेरे उठा लिए
और मुझसे

स्वर्ग छोड़ देने की विनती की
उन्होंने मुझसे कहा -
जिन नीली मुलायम संगेमरमरी आँखों की
आप तारीफ कर रहे हैं
उन्हें आठों पहर
वही सब देखना पड़ता है
जिसे आप नहीं देखना चाहेंगे कभी
यह महक भी हमारी नहीं, स्वर्ग की है

स्वर्ग से कुछ ही दूर एक सड़क थी
वहाँ सजी थी एक पान की दुकान
दुकान के पास ही एक घर था कच्चा
रात में वहीं ठहरा
सुबह मैंने उस स्त्री को देखा
जिसने रात भर मुझसे बातें की थीं
उसने मुझे उसी तरह विदा किया
जैसे करते हैं किसी के घर के लोग उसे विदा

कंधे पर एक झोला लटकाए
मैं वहाँ से झूमते हुए चला
रास्ते में मुझे एक ट्रेन मिल गई
जिसने मुझे एक छोटे से शहर में उतारा

इस शहर का सौंदर्य देखता
मैं सारा दिन घूमता रहा
पूरे दिन एक स्त्री मेरे साथ रही

यह सितंबर के आखीर की कोई शाम थी
मैदानों में भर आई घास की महक पर
मैं जैसे तैर रहा था

मोर-पंखों से भरे आसमान में
मुझे बार-बार
कोई छुप रहा लगता था

सूरज के साथ-साथ कोई स्त्री
अपने दुःख के ब्योरों में डूबती जा रही थी
पहर पर पहर कई शहर
मेरी आँखों में झिलमिला रहे थे

 


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