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कविता

सुबह
रविकांत


पुरानी पृथ्वी अब नहीं है

नर्म हवा
देह के पोरों में समा रही है
यह जेठ के पहले पानी के बाद की
ठंडी सुबह है

मैं बहुत हल्का-फुल्का-सा हुआ
छत पर खड़ा हूँ

मुँडेर से ताकता
यह चकर-मकर कौआ
मुझसे पहले जाग गया है

बारिश से
धुली गलियाँ
भीगी घास
नहाए हुए हैं मकान, और
लोग भी लग रहे हैं धुले-धुले से
कुछ सोते, कुछ उठे हुए

सफेद गुनगुने बादलों से घिरी
एक चिमनी भी है यहाँ छोटी-सी
गीले मौसम में
दिन को शुरू करती

 


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हिंदी समय में रविकांत की रचनाएँ