hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

औकात
रविकांत


मुझे
हर जगह
मेरी औकात का पता चलता है
मैं हर समय उदास रहता हूँ

जीवन की नैतिकता
एक स्वच्छ चेहरा रखने की सलाह देती है
मैं लोगों से मिलता हूँ मुस्करा के

मैं जहाँ भी जाता हूँ
जिससे भी मिलता हूँ
मुझे अपने
कल तक के जीवन का पता चलता है

कसमें खाता हूँ
प्रतिज्ञाएँ करता हूँ
रोमांच को पोर-पोर में समो लेने के लिए
ठहर जाता हूँ

रात को
कोई इच्छा धर के सोता हूँ
और सुबह सबसे पहले
भुलाता हूँ
अपने बढ़े-हुए इतिहास को

मैं
बड़े, छोटे और बराबर वालों के साथ
घूमता हूँ
दुःखी होता हूँ
लौट आता हूँ घर

केवल संगीत
केवल नृत्य
केवल दृश्य
केवल कविताएँ
केवल 'मनुष्य' ही ऐसे हैं
जो मुझसे मेरी औकात नहीं पूछते
और चलते हैं मेरे साथ

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में रविकांत की रचनाएँ