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कविता

दीदी
रविकांत


नहीं बताएँगी दीदी
अपने पर गुजरी हुई बात
मन की बात
दीदी मन ही में रखेंगी, कुछ दिन
उसे पुरानी पड़ने देंगी वो

माँ नहीं हैं घर में
बहन दूसरी भी नहीं है यहाँ
यहाँ जैसे दीदी अकेले हैं एकदम,
जबकि
इस सन्नाटे के बावजूद
भरा-पूरा है घर
पिता हैं
भइया हैं
मैं हूँ!

कोई बात है
जिसे दीदी
केवल मुझी से बताएँगी कभी
क्योंकि मुझी से मिलेगा उन्हें बल
कहती हैं दीदी, और
दुःख से भीग-भीग जाता है उनका स्वर

 


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