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कविता

सबेरे-सबेरे और अखबार
रविकांत


यह जनवरी का अंतिम दिन है
बाहर आज कुछ कम कोहरा है
सुबह के आठ बज गए है

मैं बिस्तर से सो कर उठा हूँ
दिमाग थक गया है
(अवचेतना की न जाने किस
गंभीर बहस में फँस कर)

मुँह धो कर, बैठता हूँ, पस्त, कुर्सी पर
सामने रख दी जाती है चाय
मैं कप की ओर देखता हूँ
और सोचता हूँ अखबार के बारे में

तभी खबर दी जाती है -
घर में कुछ नहीं है
'घर में
न आटा है
न घी है
न दाल है '

मैं सोचता हूँ पैसों के बारे में

हालाँकि सोच यह रहा था कि
चाय और अखबार से आएगी
नए दिन की चेतना
पर, 'अखबार तो अभी आया नहीं है '

चाय उठाता हूँ
यह गर्म नहीं रही अब

पहनता हूँ
बिस्तर के सिरहाने रखा हुआ
रात का कुर्ता
कुछ देर ढूँढ़ना पड़ता है झोला
हाथों से बाल फेरते हुए
गली में आता हूँ
बच्चे खेल रहे हैं टेना

सोचता हूँ,
बल्कि जानता हूँ
कल रात जिस संसार को छोड़ आया था
स्टेशन के आस-पास
वह वैसा ही होगा
जस का तस

पंसारी की ओर बढ़ते हुए
आगे-आगे दिखता है
नार्थ स्टार का भूरा जूता
मोदियाइन को आटा तौलते हुए देख कर
अपनी खाली जेबों में फेरता हूँ हाथ
फिर से

उलझन में हूँ
खयाल में आता है अखबार
सायकिल में सज कर
किसी गली से गुजरता हुआ

आता हुआ
कोई
हाहाकार

 


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