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कविता

मार्केटिंग
रविकांत


उबलती हुई चीखें हैं
अँधेरे में ठंडाते हैं दर्शक
नजदीक से आती हुई
किसी की अंतिम कराह को सुनकर
ढूँढ़ा जाता है
रघुवीर सहाय की-सी किसी कविता में
उसका हल

मनोरंजन का बाजार
ऊब की दुनिया में
फैलता चला गया है

और ज्यों-ज्यों
विभीषिकाएँ नजदीक आती गईं हैं,
पॉलीथीन बंद ऊब का सट्टा बाजार
अपने सुनियोजित तरीकों से
सारी दुनिया में फैला दिया गया है

हमारे रोएँ, बाल; और
त्वचा, खाल बनती जा रही है

इसका अर्थ?
और क्या अर्थ हो सकता है इसका!

 


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हिंदी समय में रविकांत की रचनाएँ