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कविता

सहयोग के अगले सिरे पर
रविकांत


जो लंबे समय से
करता आ रहा है सहयोग
सबका
उसकी ओर से
निश्चिंत हो गया
कोई...

'उसे तो करना ही चाहिए यह
यही स्वभाव है उसका
दूसरा है भी क्या उसके पास
करने को

यदि नहीं करना है अब उसे
मेरा सहयोग,
अपना काम उसे
इतना ही जरूरी हो गया है अगर,
तो जाय
जहाँ जाना हो जाय, सिर पिटाए,
मेरा क्या है
सौ मिलेंगे मुझे उसके-से

अगर ऐसा है, सच में
तो उससे कह दो
आ कर
अपना सामान सब
ले जाए'

 


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