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कविता

जरूरी काम
रविकांत


बढ़ रहा है हमारे खेतों में
न जाने क्या-क्या
हमारी निगरानी में
न जाने कैसी फसल पक रही है

दुःख रोपे जा रहे हैं
नई-नई चमकीली, चिकनी गाँठें
अपने अत्याधुनिक पेंचों के साथ
बहुमत को डरा रही हैं
सींची जा रही हैं सभी चीजें

हार की परिस्थितियाँ परिपक्व हो रही हैं
और
न जाने कहाँ व्यस्त हैं हम

 


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हिंदी समय में रविकांत की रचनाएँ