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कविता

रीवाँ
रविकांत


(इलाहाबाद के रिक्शाचालकों के लिए)

रीवाँ एक भोला-भाला शहर है
जिसकी बाँह में
जिंदगी को, देश को और भी बहुत सी चीजों को
आगे खींचने की ताकत है
यह शहर
अपने अभावों के प्रति संवेदनशील, किंतु
अपने गौरव से वंचित है

मेरे सपने में यह शहर
छोटा भाई बनकर आता है, और
रात-भर, मेरे बगल में
उनींदा लेटा रहता है
एक दिन इसने मुझसे कहा

मैं उत्तर प्रदेश में मिल जाना चाहता हूँ, जैसे
बहुत सारे शूद्र मुसलमान हो जाना चाहते हैं

मैंने उसे समझाया
जैसे साठ साल
वैसे कुछ और धैर्य रखो
तुम्हारी भी पूछ होगी
तुम्हारा श्रम इसी तरह नहीं मारा जाता रहेगा
सरकार जरूर कुछ विकास करेगी
लेकिन वह नहीं माना
धीरे-धीरे भयापे से भरा उसका गला
पतला होने लगा
और वह
सोए हुए लोगों के 'बाबूजी' कहने लगा

मेरी नींद कुछ टूटी
तंद्रा में ही मैने कहा -
जाओ रीवाँ! जाओ
भोपाल जाओ
दिल्ली के किसी बड़े फाटक में जाकर अँड़स जाओ
आवाज लगाओ...

जब मेरा पैर
चारपाई के नीचे की ठंडी जमीन पर पड़ा
मेरे कमरे को रौंदता हुआ
ट्रकों का एक काफिला
इस शहर को लादे ले जा रहा था;
पता करने पर मालूम हुआ
एक विशालकाय रिक्शेवाले के रूप में
यह शहर
पहले इलाहाबाद के आस-पास घूमता है
फिर
बहुत सारे रिक्शों में तब्दील हो जाता है

 


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