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कविता

पारस
रविकांत


मैं थक कर बैठा था
जिस मिट्टी के ढेर पर
वह धीरे-धीरे
सोने की अशर्फियों में बदलने लगी

पता नहीं क्यों
कुछ लोग मेरी स्तुति
और शेष मेरी प्रशंसा करने लगे

फिर, जब मैंने
खरीदना शुरू किया मिट्टी के ढेर
लोगों ने कहा -
मिट्टी हो गई है इसकी बुद्धि
इसका सब बल मिट्टी हो जाएगा

 


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हिंदी समय में रविकांत की रचनाएँ