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कविता

नाम
कुमार अनुपम


जिस नाम से पुकार कर

माँ थमा देती थी उसे सामान का खर्रा

मित्र उस नाम से अनजान थे

 

मित्र उसे ही समझते थे वास्तविक नाम

महज तुक पुकारने पर जिसका

वह फाँद आता था दीवार

 

एक नाम उसका

पहचान की पुस्तक-सा

खुला रहता था जिसकी भाषा

नहीं समझती थी उसकी प्रेमिका

 

जिस नाम से अठखेलियाँ करती थी उसकी प्रेमिका

वह अन्य सबके लिए हास्यास्पद ही था

 

इस तरह 

सबके हिस्से में

हँसी बाँटने की भरसक कोशिश करता डाकिए-सा

जब हो जाता था पसीना पसीना

वह खोल देता था अपने जूते

अपनी आँखें मूँद कर

कुछ देर सोचता था -

अपने नामों और अपने विषय में

हालाँकि ऐसा कम ही मिलता था एकांत


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