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कविता

बातूनी
कुमार अनुपम


कुछ न करते हुए बैठे-ठाले

ऊब होती और इस तरह

बात शुरू होती

 

तो बात करनी हो कुछ भी

शुरुआत मौसम से होती अकसर

मुहावरे बनते कि जनाब

लड़कियों और शहर के मिजाज

का ठिकाना नहीं तनिक भी

 

मूँगफली फोड़ते बातों के दाने

पास बैठे लोग भी टूँगते

चिंता की चटनी चाटते चटखारे लेते

कि सचमुच मौसम बड़ा ही खराब है आजकल

 

अगली पिछली सीटों की तरफ

उमस की तरह फैलने लगता

एक सहकारी दुख

 

होते-होते

बातूनी दुखी होते

और बात अंततः

पहुँच ही जाती राजनीति की ऐशगाह तक

जहाँ सार्वजनिक समर्थन के साथ

बलात्कार का आयोजन जारी अहर्निश

 

असह्य पीड़ा से लथपथ

कसमसाते बातूनी अपनी सीट पर और सब

उठाकर हाथ

असहाय होने का रोना रोते कि अचानक

बातूनी एक

बात और पीड़ा और सहानुभूति और सीट अपनी छोड़कर

उठ जाता था कहता हुआ कि अच्छा भई

मेरा तो आ गया स्टॉप!

 

एक खड़ा हुआ बातूनी सीट छेंक लेता था


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