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कविता

मैं एक शब्द लिखता हूँ
कुमार अनुपम


मैं एक शब्द लिखता हूँ ऐन उसके पहले

वे तय कर देते हैं उसका अर्थ

कई बार तो मेरे सोचने से भी पूर्व

 

वे खींच देते हैं दो पंक्तियाँ

और कहते हैं

उतार लो इनमें आज का पाठ

सुलेख लिखो सुंदर और कोमल लिखो अपने दुख

 

हमारे संताप रिसते हैं निब के चीरे से

कागज की छाती पर कलंकित

 

अचानक प्रतिपक्ष तय करती एक स्वाभाविक दुर्घटना घटती है

कि स्याही उँगलियों का पाते ही साथ

पसर जाती है

 

माँ का आँसू अटक जाता है

पिता की हिचकियाँ बढ़ जाती हैं

बहनें सहमकर घूँट लेती हैं विलाप

भाई एक धाँय से पहले ही होने लगते हैं मूर्च्छित

 

आशंकाओं के आपातकाल में

निरी भावुकता ठहराने की जुगत में जुट जाते हैं सभी

कि माफ करें बख्शें हुजूर क्षमा करें गलती हुई

 

पर वे ताने रहते हैं कमान-सी त्यौरियाँ

 

फिलहाल मेरे हाल पर फैसला

एक सटोरिया संघसेवक पर मुल्तवी करता है

जबकि उस जाति में पैदाइश से अधिक नहीं मेरा अपराध

जिस बिरादरी का ‘सर’ बना फिरता है वह

 

मसलन,

यह नागरिकता के सामान्यीकरण का दौर है

यह स्वतंत्रता के सामान्यीकरण का दौर है

यह अभिव्यक्ति के सामान्यीकरण का दौर है

यह ऐसा दौर है जब

जीवन का अर्थ कारसेवा घोषित किया जा रहा

 

मैं एक शब्द लिखता हूँ

और जिंदा रहने की नागरिक कवायद में

जीता हूँ मृत्यु का पश्चात्ताप संगसार होता हूँ बार-बार

 

और मैं एक और शब्द लिखता हूँ...


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