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कविता

यात्रा
कुमार अनुपम


रास्ते हमारे इंतजार में थे लिपट गए कदमों से जैसे बच्चे (किसमें वो साहस है जो झटके) हम निकले उँगली थामे उनकी हाट जिस तरफ थी क्योंकि वहीं हमारी खुशियों की भी जमघट थी हम निकले क्या करते जबकि हाट की भाषा बिलकुल अनजान अन्य देश (?) की भाषा लगती थी जहाँ हमारी खुशियाँ थीं आकार दाम जिनके द्वारा हम उन्हें जरा पहचानने का अनुमान लगा सकते थे, उनके नाम का कान पकड़ कर क्रूर हाट ने इतना खींचा था कि हमारी खुशियों के सुंदरतम चेहरे अब तो बहुत डरावने रहस्यमय लगते थे

 

(हाट रहस्य गढ़ता है सबसे पहले जिसके बदले हर लेता है ध्यान और भय भर देता है, भय - जिसके आगे नतमस्तक हम हैं प्राचीनकाल से)

इसलिए हाट सबसे पहले भाषा की देह छीलता है फिर इच्छाएँ फिर हथेलियाँ

करते क्या आना था हमको बारबार छलावे में ही आना था जैसे सभी रास्तों की डोर हाट के हाथों में थी

 

क्या बतलाऊँ यही मनौती मानी साफ शब्द में ठेठ पैलगी बची रहे होठों पर मिलते हुए कामगार बुजुर्गों की खातिर यही मनोरथ बची रहे दादी रैफुल की बकरी जिसे चराने हम ले जाते थे और पुराने मंदिर के पीछे दूध गार कर पी लेते थे कब चाहा था साथ रास्तों का छूटे आए हाट जहाँ हमारी खुशियाँ - कृत्रिम खुशियाँ - चुंबक जैसी खींच रही हैं दाएँ बाएँ भाग रहे थे बच्चों जैसे रास्ते हमारे मेंढ़ों के थे, चाहा, इतना ही चाहा, मिलता रहे रास्ते में लगभग थकान के ठीहे पर नूरुल्ला का खेत कि जिससे गन्ने जैसा अपना रिश्ता तो अजल के रोज से है


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