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कविता

रोजनामचा
कुमार अनुपम


सुबह काम पर निकलता हूँ

और समूचा निकलता हूँ

 

काम पर जाते जाते हुए

पाँव होता हूँ या हड़बड़ी

धक्के होता हूँ या उसाँस

 

काम करते करते हुए

हाथ होता हूँ या दिमाग

आँख होता हूँ या शर्मिंदा

चारण होता हूँ या कोफ्त

उफ्फ होता हूँ या आह

 

काम से लौटते लौटते हुए

नाखून होता हूँ या थकान

बाल होता हूँ या फेहरिश्त

 

शाम काम से लौटता हूँ

और मांस मांस लौटता हूँ समूचा

(उम्मीद की आँखें टटोलती हैं मुझे मेरे भीतर)

हड्डियों और नसों और शिराओं में रात

कलपती रहती है सुबह के लिए


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