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कविता

शहर के बारे में
कुमार अनुपम


उस शख्स की डायरी में निम्नलिखित पंक्तियाँ दर्ज मिलीं जिसे शहर द्वारा विक्षिप्त घोषित कर दिया गया था और शहरबदर की सजा सुनाई गई थी कि उसके पास लिखने की जरा काबिलियत थी वह पान का खोखा लगाता था अपने बीवी बच्चों के साथ दाल भात प्याज खाता था और अपनी बेपनाह बनारसी हँसी से भिगो देता था पूरा का पूरा शहर

 

क.

 

जिस शहर की रगों में

नहीं बहती है कोई नदी

उस शहर का

दिल से कोई रिश्ता नहीं होता

 

ख.

 

धूप में पकती निबौरियों

की मिठास

हवा को सोंधी स्वस्थ गमक से भर देती

पर, शहर से कहाँ गायब हो गए

नीम के सारे के सारे दरख्त

 

फ.

 

शहर में ऊँची ऊँची इमारतें

इमारतों की फुनगी पर बैठा हुआ कौवा

देखता है नीचे और करता है अट्टहास

कि देखो देखो कितने तुच्छ दिख रहे हैं

जमीन पर रेंगते हुए आदमी

 

ब.

 

शहर में दो तरह के प्राणी रहते हैं

 

सफल कौवे

और

असफल विक्षिप्त

 

भ.

 

एक दूरबीन निगाह रखती है पल पल

सारे शहर पर

 

कौन कैसे हँसता है कितने इंच दाँत चियार

किसको आते हैं आँसू सचमुच के

किसकी यारबाश आदतें

शहर के मानकों के लिए विध्वंसक

 

उन विक्षिप्तों की शिनाख्त

युद्धस्तर पर जारी है

 

म.

 

हँसो तो ऐसे जैसे बॉस हँसता है बेवजह

 

रोओ तो ऐसे जैसे सौंदर्य प्रतियोगिता

का ताज सिर पर पकड़ती खुनुकती है मिसवर्ल्ड

 

गिरो तो ऐसे जैसे गिरती हैं

अवैध रहनवारियाँ

 

उठो तो ऐसे

जैसे बीयर की बोतल से झाग उठता है

 

शहर में जीवन की नई आचारसंहिता

उपलब्ध है हर शॉपिंग मॉल में

किफायती मूल्य पर आकर्षक ऑफर के साथ

 

त्र.

 

जल्द ही

शहर अपनी अंधी रफ्तार में भागता बेतहाशा

चला जाएगा अस्तित्व से इतना दूर कि समय

उसके चिह्न तक खोजे न पाएगा अपनी स्मृति तक में

 

मेरा शाप है


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