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कविता

साइकिल सवार
बसंत त्रिपाठी


चढ़ाई में उचक-उचक कर
पैडल पर पाँवों का जोर लगाए
निकल गया है
साइकिल सवार

हवा में उसकी उछाल बची है
उसकी फूली हुई साँस
और तना हुआ चेहरा

हाथ के अँगूठे से बजाई गई घंटी की
टिन् टिन् ... टिन् टिन् ...
वह
ओझल हुआ
कि दूसरा निकला ठीक वैसे ही
चढ़ाई ने दोनों को एक-सा कर दिया है

मुझे अपनी रफ्तार पर शर्म आई
जब से इस मोटर साइकिल का
कान उमेठने लगा हूँ
चढ़ाई के संकट को भूलता गया हूँ

 


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