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कविता

लोकतंत्र
बसंत त्रिपाठी


एक सूना-सा आकाश है
इतना सूना
कि तारों की टिमटिमाहट
लगता कि सुनाई पड़ रही

इतने-इतने शोर के बीच
चुप्पी भली लगती
किसी एक शहर से
किसी दूसरे शहर को जाते राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे
रहता हूँ मैं

यहाँ फूल है और महक है
कुत्तों की कुँकुआहट है
दबे पाँव बिल्ली एक की छत से
कूदी है दूसरे की छत पर

थोड़ी-सी घास है
जो दिन में हरी और रात में काली है
यह छत पर खड़े होकर अलग-अलग समय में
घास को देखना है

चौकीदार की सीटी अभी-अभी
इस सड़क से गुजरी थी
और अब केवल सन्नाटा है

रात के तीन बजे हैं
मैंने घड़ी देखी
ट्रक ड्राइवर ढाबे में आखिरकार सो गए हैं
थोड़ी-सी अफीम के सहारे

कितनी आसान-सी लग रही है रात
बिल्कुल फिसलती हुई
रेशम की डोर
लेकिन सबके लिए इतनी ही आसान नहीं है

मेरा मैं
सूने आकाश में तारों की टिमटिमाहट सुनता है
मेरा वह
शहर में फौजी जूतों की कड़कड़ टापें

 


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