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कविता

मोहल्ले में पानी
संजय कुंदन


एक खबर की तरह था वहाँ
पानी का आना और जाना
कोई दावे के साथ

नहीं कह सकता था
कि इतने बजे आता है
और इतने बजे चला जाता है पानी

कुछ औरतें पानी को
साधना चाहती थीं

वे हर समय नल की ओर
टकटकी लगाए रहतीं
हर आवाज पर चौंकतीं
एक गौरैया जब खिड़की से कूदती
उन्हें लगता पानी आ गया है
एक कागज खड़खड़ाता
तो लगता यह पानी की पदचाप है
उनकी नींद रह-रह कर उचट जाती थी

कितना अच्छा होता
पानी बता के जाता
- कल मैं पौने सात बजे आऊँगा
या नहीं आऊँगा
कल मैं छुट्टी पर हूँ

एक आदमी सुबह-सुबह
टहलता हुआ
पूछता था दूसरे से
पानी आया था आपके यहाँ
दूसरा जवाब देता - आया था
मैंने भर लिया
तीसरा कहता था चौथे से
- मैं भर नहीं पाया
पर कल जल्दी उठूँगा
भर के रहूँगा

सबसे चुप्पा आदमी भी
अपना मौन तोड़ बैठता था
पानी के कारण
पहली मंजिल पर रहने वाले एक आदमी ने
दूसरी मंजिल के पड़ोसी से
सिर्फ पानी के कारण बात शुरू की
और बातों में रहस्य खुला कि
दोनों एक ही राज्य के एक ही जिले के हैं

लोग मिलते तो लगता
वे नमस्कार की जगह
कहेंगे - पानी
और उसका उत्तर
भी मिलेगा - पानी

 


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