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कविता

एक नींबू के सहारे
संजय कुंदन


नींबू के टुकड़े को कस कर निचोड़ रहा हूँ दाल पर
कि थोड़ा रुच जाए खाना
लंबे ज्वर से उठने के बाद खोज रहा हूँ फिर से स्वाद

थोड़ा खट्टा रस फिर जोड़ सकता है अन्न से रिश्ता
एक शीतल चमकदार नींबू पर इतनी ज्यादा टिक गई है उम्मीद कि
लगता है वही मेरे कपड़े निकाल लाएगा
मेरा चश्मा और थैला भी
वह एक रिक्शे वाले को आवाज देगा और उसे हिदायत देगा
इन्हें ठीक से ले जाना भाई

 


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