hindisamay head


अ+ अ-

कविता

इसी जनम में

संजय कुंदन

अनुक्रम अध्याय 1     आगे

वह जो मन की चहचहाहट पर गुनगुनाता था
मन की लहरों में डूबता-उतराता था
पकता रहता था मन की आँच में
वह जो चला गया एक दिन
मन के घोड़े की रास थामे
साँवले बादलों में न जाने कहाँ
वह मैं ही था

विश्वास नहीं होता
यह इसी जनम की बात है।

 


>>आगे>>