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कविता

कोजागर
नामवर सिंह


कोजागर
दीठियों की डोर-खिंचा
(उगते से) इंदु का आकाशदीप-दोल चढ़ा जा रहा।

गोरोचनी जोन्ह पिघली-सी
बालुका का तट, आह, चंद्रकांतमणि-सा पसीज-सा रहा।

साथ हम
नख से विलेखते अदेखते से
मौन अलगाव के प्रथम का बढ़ा आ रहा।

अरथ-उदास में, कपास-मेघ जा रहा।

नीर हटता-सा
क्लिन्न तीर फटता-सा गिरा
किंतु मूढ़ हियरा, तुझे क्या हुआ जा रहा।

 


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