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कविता

भर दो मुझे
आर अनुराधा


मेरे सीने में
बहुत गहराई है
और बहुत खालीपन है
भुरभुरी
बालू की तरह
भंगुर हैं मेरी पसलियाँ
इन्हें भर दो
अपनी नजरों की छुअन से
गर्म सलाखों-सी तपती
हर समय दर्द की बर्फीली आँधियों में
नर्म हथेलियों की हरारत से
इन्हें ठंडा कर दो

जैसे मूसलाधार बरसात के बाद
भर जाते हैं ताल-पोखरे
ओने-कोने से, लबालब
शांत नीला समंदर
भरता है हर लहर को
भीतर-बाहर से
या पतझड़ भर देता है
सूखे पत्तों से
किसी वीरान जंगल की
मटियाली सतह को
कई परतों में
इतने हल्के से कि
एक पतली चादर सरसराती हवा की
सजा दे और ज्यादा उन पतियाली परतों को
उनके बीच की जगहों को भरते हुए।
अगर तुमने देखा हो रेतीला बवंडर
जो भर देता है
पाट देता है पूरी तरह
आकाश-क्षितिज को
बालू के कणों से
जैसे भर जाती है
हमारे बीच की हर परत, हर सतह
प्रशांत सागर-से उद्दाम प्रेम से
वैसे ही भर दो मुझे गहरे तक
कि परतों के बीच
कोई खालीपन भुरभुरापन कोई दर्द
न रहे बाकी
रहे तो सिर्फ
बादल के फाहों की तरह
हल्की मुलायम सतह सीने की
और उसमें सुरक्षित
भीतरी अवयव।

 


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