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कविता

देह की भाषा
आर अनुराधा


देह के मुहावरे अजीब होते हैं
भाषा अजीब होती है
तकलीफ दूर करने के लिए
तकलीफ माँगती है
आराम पाने के लिए
बेआराम होना माँगती है
बोलती है गर्मियों की उमस भरी बेचैनी
ठीक बीच रात में
दिसंबर की बर्फीली ठंड में भी
जब वह घिरी होती है
हार्मोन की ऊँची-नीची लहरों से
भरी गर्मी में
बतियाती है ढेर-सा पसीना
और हो जाती है ठंडी, निश्चल, चुप
चुप रहती है
जब कहने की जरूरत सबसे ज्यादा हो
चुप हो जाती है
जब बातें करने को लोग सबसे ज्यादा हों
आस-पास जमा हुए, आपस में बतियाते
उस बीच में रखी देह के बारे में
जो चुप हो गई
इस वाचाल को चाहिए एकांत, सन्नाटा
जब पास कोई न हो
तो बोलती है
बेबाक, बिंदास
अपने मन की,
देह की
फिर समेटती है अपने शब्द
चुन-चुन कर एक-एक
दिखाती है कविराज को
और पूछती है नुस्खे
उन्हें शांत करने के,
बुझाने के
क्योंकि देह का बोलना
यानी शब्दों का खो जाना

 


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