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कविता

समुद्र के प्रति
इब्राहीम अल-रुबाइश


समुद्र, मेरे प्रियजनों के समाचार तो दो

बेधर्मी लोगों की जंजीरें न होतीं,
तो मैं तुम्हारी लहरों में कूद पड़ता
और पहुँच जाता अपने प्रिय परिवार के पास
या फिर
दम तोड़ देता तुम्हारी बाँहों में

तुम्हारे तटों पर है
उदासी, कैद, पीड़ा
और, अन्याय
तुम्हारी कटुता
मेरे धीरज को खाती जा रही है

तुम्हारी शांति मौत की तरह है
विचित्र हैं तुम्हारी तेज लहरें
तुम से निःसृत हो रही है जो शांति
उसकी मुट्ठी में विश्वासघात है

तुम्हारी मौनता बनी रही
तो वह कैप्टन की जान ले लेगी
वह गायब हो जाएगा
तुम्हारी लहरों में

मंद, वधिर, बेआवाज, उपेक्षा-रत, गुस्से से उफनते हुए
तुम वाहक हो कब्रों के
जब हवा क्रुद्ध कर देती है तुम्हें
अपना अन्याय दिखाई देने लगता है

जब वह तुम्हें खामोश कर देती है
रह जाता है बस ज्वार और भाटा

समुद्र, क्या हमारी जंजीरें तुम्हें नाराज कर देती हैं?
यह मजबूरी है
जिसके तहत हम रोज आते और जाते हैं
तुम्हें मालूम हैं हमारे पाप?
तुम जानते हो कि
हमें ढाल दिया गया है
इस मायूसी में?

समुद्र, तुम हमारी बंदी-दशा पर तंज करते हो
मिल गए हो तुम हमारे दुश्मनों के साथ
और बेदर्दी के साथ पहरा देते हो
हम सबों पर
क्या चट्टानें उन अपराधों के बारे में
तुम्हें नहीं बतातीं
जो किए जाते हैं उन के मध्य?

क्या क्यूबा, परास्त, अपनी आपबीतियों का
अनुवाद नहीं करता तुम्हारे लिए?
तीन सालों से तुम हो हमारे बगल में
और तुम्हें क्या हासिल हुआ?
लहरों पर कविताओं की नावें;
दहकती छाती में
दबाई हुई लपट
कवि के शब्द हमारी ताकत के फांट हैं
उसकी कविता मरहम है
हमारे गमगीन दिलों के लिए

(इब्राहीम अल-रुबाइश की यह कविता येल विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'पोएम्स फ्रॉम गुंतानामो: द डिटेनीज़ स्पीक' में शामिल है। गुआंतानामो  की जेल में वे लोग निरुद्ध किए जाते रहे हैं जिन्हें संयुक्त राज्य सरकार की सरकार आतंकवादी मानती है। कलम-कागज से वंचित इन कैदियों ने चाय के प्यालों पर, प्लास्टिक चम्मचों के सहारे खुरच-खुरच कर और दूसरे अकल्पनीय साधनों का इस्तेमाल करके ये कविताएँ लिखीं और हमकैदियों से साझा कीं। इब्राहीम अल-रुबाइश की यह कविता इन्हीं में एक है और कालीकट विश्वविद्यालय की स्नातक स्तर की अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तक 'लिटरेचर एंड कंटेम्पररी इश्यूज' में कई वर्षों से शामिल रही है। हाल ही में विश्वविद्यालय ने इस कविता को इस पाठ्य पुस्तक से निकाल दिया है।)

 


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हिंदी समय में इब्राहीम अल-रुबाइश की रचनाएँ