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कविता

कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं
प्रांजल धर


इतना तो कहा ही जा सकता है कि कुछ भी कहना
खतरे से खाली नहीं रहा अब
इसलिए उतना ही देखो, जितना दिखाई दे पहली बार में,
हर दूसरी कोशिश आत्महत्या का सुनहरा आमंत्रण है
और आत्महत्या कितना बड़ा पाप है, यह सबको नहीं पता,
कुछ बुनकर या विदर्भवासी इसका कुछ-कुछ अर्थ
टूटे-फूटे शब्दों में जरूर बता सकते हैं शायद

मतदान के अधिकार और राजनीतिक लोकतंत्र के सँकरे
तंग गलियारों से गुजरकर स्वतंत्रता की देवी
आज माफियाओं के सिरहाने बैठ गयी है स्थिरचित्त,
न्याय की देवी तो बहुत पहले से विवश है
आँखों पर गहरे एक रंग की पट्टी को बाँधकर बुरी तरह...

बहरहाल दुनिया के बड़े काम आज अनुमानों पर चलते हैं,
- क्रिकेट की मैच-फिक्सिंग हो या शेयर बाजार के सटोरिये
अनुमान निश्चयात्मकता के ठोस दर्शन से हीन होता है
इसीलिए आपने जो सुना, संभव है वह बोला ही न गया हो
और आप जो बोलते हैं, उसके सुने जाने की उम्मीद बहुत कम है...

सुरक्षित संवाद वही हैं जो द्वि-अर्थी हों ताकि
बाद में आपसे कहा जा सके कि मेरा तो मतलब यह था ही नहीं
भ्रांति और भ्रम के बीच संदेह की सँकरी लकीरें रेंगती हैं
इसीलिए
सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि कुछ भी कहना
खतरे से खाली नहीं रहा अब !

('जनसत्ता', 26 अगस्त 2012)

इस कविता पर प्रांजल धर को 2012 का भारत भूषण अग्रवाल सम्मान प्राप्त हुआ है। सम्मान के निर्णायक पुरुषोत्तम अग्रवाल की टिप्पणी :

युवा कवि प्रांजल धर ने पिछले कई सालों से अपनी सतत और सार्थक सक्रियता से ध्यान आकृष्ट किया है। 'जनसत्ता' में 26 अगस्त 2012 को प्रकाशित उनकी कविता " कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं" सचमुच भयानक खबर की कविता है। यह कविता अपने नियंत्रित विन्यास में उस बेबसी को रेखांकित करती है, जो हमारे सामाजिक-राजनैतिक जीवन को ही नहीं, हमारी भाषा और चेतना को भी आच्छादित करती जा रही है। लोकतंत्र एक औपचारिक ढाँचे मात्र में बदलता जा रहा है। स्वतंत्रता और न्याय जैसे मूल्यवान शब्दों का अर्थ ही उलटता दिख रहा है। नैतिक बोध की खोज की जगह सुविधाजीविता ने ले ली है। इस सर्वव्यापक नैतिक क्षरण को प्रांजल धर बहुत गहरे विडंबना-बोध के साथ इस सधे हुए विन्यासवाली कविता में मार्मिक ढंग से ले आते हैं। निश्चयात्मक नैतिक दर्शन से वंचित इस समय का बखान करती इस कविता में 'अनुमान' शब्द ज्ञान मीमांसा के अनुमान का नहीं, सट्टेबाजी के 'स्पेकुलेशन' का वाचक बन जाता है, और आत्महत्या का 'पाप' बुनकरों तथा किसानों की विवशता का। जिस समय में कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं रहा, उस समय के स्वभाव को इतने कलात्मक ढंग से उजागर करनेवाली यह कविता निश्चय ही 2012 के भारत भूषण अग्रवाल सम्मान के योग्य है।


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