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कविता

हरी मिर्च - 3
सदानंद शाही


वहाँ तरह-तरह की वनस्पतियाँ थीं
बरगद के वन
महुआ के जंगल
और फलों से लदी अमराइयों के पार
सब्जियों की लंबी कतार में भटक रहा था - मैं
अचानक उसने मेरा रास्ता रोक कर कहा -
'आइए! बाईसवीं सदी में आपका स्वागत है'
वह एक हरी मिर्च थी।


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