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कविता

वह बिगड़ैल लड़की
सदानंद शाही


हाथ के तोते
खुद ही उड़ाकर
खुश हो सकती है
कि चलो
तालियाँ तो बजा सकते हैं

समझदारों के हर सुझाव के ठीक
उलट चलकर
जड़ सकती है तमाचा

ऐसी हर समझदारी के मुँह पर
जो समझौते से आती है

हथेली पर इंद्रधनुष उगाने का
सपना लिए
लगा सकती है
पृथ्वी के पूरे सात चक्कर
और खाली हाथ लौटकर भी
खिलखिला सकती है

घर हो या घरौंदा
किसी पिजड़े में नहीं बसते
उसके प्राण

आकाश के इस छोर से
उस छोर तक
विचरते हैं

शताब्दियाँ बीत गईं
विपरीतताओं से लड़ते हुए
थके नहीं उसके पाँव

पुरुषों के बियाबान जंगल में
सीधी तनी हुई
चलती चली जा रही है
वह बिगड़ैल लड़की।

 


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