hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कहानी

भू्त का भविष्य
शशिभूषण द्विवेदी


यदि अल्लाह ने उनके लिए देश-निकाला न दे दिया होता तो दुनिया में वह उन्हें अवश्य यातना दे देता और आखिरत (परलोक) में तो उनके लिए आग की यातना ही है।

- ( कुरान-ए-पाक , सूरा अल-हश्र , 59 / 3 )

नाना भूत पालते थे। जब वे मरे तो सारे भूत उड़ गए थे। मैं नाना की मौत पर नहीं जा पाया। गया होता तो शायद उनके उड़ते हुए भूतों को देख सकता।

नाना बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन जाने कहाँ से उन्होंने रामचरित मानस और भगवत गीता रट रखी थी। उनका असली नाम तो पं. रामनिवास था लेकिन लोग उन्हें तुलसीदास ही कहते। दरअसल, वे तुलसी की माला पहनते थे और रोज रामचरित मानस का पाठ करते। इसीलिए लोग उन्हें तुलसीदास ही कहते। गांधीजी की तरह उन्होंने भी एक हाथ में लाठी ले रखी थी और अक्सर एक धोती में ही रहते। कुर्ता तो शादी-ब्याह में ही कभी-कभार पहना होगा। पूजा-पाठी आदमी थे और भयानक मुँहफट। किसी को किसी की माँ-बहन करानी हो तो लोग उन्हीं का इस्तेमाल करते। वे बहुत अक्खड़ और कड़क इनसान थे। हम बच्चे उनसे बहुत डरते थे। बखरी के ऊपर उनका अपना एक निजी एकांत था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ जाने की किसी को अनुमति नहीं थी। नानी को भी नहीं। नाना वहाँ ताला लगा कर रखते थे। यहीं उनकी भूतगाह भी थी, मंदिर भी और उनका अपना छोटा-मोटा खजाना भी। एक बार शरारतन मैं वहाँ घुस गया था। मैंने देखा था कि घुप्प अँधेरे में वहाँ एक दीया टिमटिमा रहा है बस। नाना टार्च की रोशनी में किसी चीज को ढूँढ़ रहे थे। वहाँ तमाम देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और पोस्टर चिपके हुए थे। एक बक्सा था जिस पर नाना ने बड़ा-सा ताला लटका रखा था। मेरे लिए वह एक रहस्यमय दुनिया थी जहाँ भूत रहते थे। मुझे तब लगा था कि भूत इसी बक्से में बंद रहते होंगे। मुझे डर भी लगा था, लेकिन चूँकि बक्से पर ताला लगा था इसलिए उतना डर भी नहीं लगा था। उस दिन नाना कमोबेश अच्छे मूड में थे। टार्च की रोशनी में उन्होंने मुझे देखा और प्यार से अपने पास बुलाया और बक्से का ताला खोला। जब वे बक्से का ताला खोल रहे थे तब मैं बहुत डर गया था क्योंकि मुझे पता था कि नाना भूत पालते हैं और अपने भूतों को इसी बक्से में ताला लगा कर रखते हैं। लेकिन आश्चर्य! बक्से का ताला खुलने के बाद उसमें से कोई भूत नहीं निकला था। बक्से में एक पोटली थी जिसमें कुछ फुटकर नोट और सोने-चाँदी के सिक्के थे। कुछ धार्मिक किताबें थीं। तंत्र-मंत्र का कुछ सामान। जमीन-जायदाद और मुकदमेबाजी के कुछ कागजात और दैनिक खर्चों के हिसाब-किताब की एक डायरी थी। इसके अलावा एक तुलसी और रुद्राक्ष की माला थी। साथ में था गांधीजी का फटा-पुराना ब्लैक एंड व्हाइट चित्र। बक्से में लेमनचूस और कुछ मिठाई भी उन्होंने सँभाल कर रखी थी जिसमें से एक लेमनचूस और थोड़ी-सी मिठाई उन्होंने मुझे खाने को दी थी।

उस दिन चाँदा बाजार का साप्ताहिक मेला लगा था जहाँ की गुड़ की चोटहिया जलेबी बहुत प्रसिद्ध थी। नाना का अच्छा मूड देख कर मैं उनसे मेला देखने की जिद करने लगा था। उस दिन जाने क्या था कि मेरे कंजूस नाना बहुत खुश थे और उन्होंने मुझे मेला देखने के लिए एक रुपया भी दिया था। लेकिन मेरी दिलचस्पी नाना के भूतों में थी और मैं उनसे भूतों के किस्से सुनाने की जिद करने लगा था। मेरी जिद को दरकिनार करते हुए नाना ने बक्से से गांधीजी का चित्र निकाला और झाड़-पोंछ कर साफ करने लगे। फिर उसे किसी अनमोल अमानत की तरह उन्होंने बक्से में सँभाल कर रख दिया था। गांधीजी का चित्र मैंने अपनी स्कूली किताबों में देखा था और पढ़ा था कि उन्होंने अंग्रेजों से देश को आजादी दिलाई थी। मैं अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर नाना को गांधीजी के बारे में बताने लगा। नाना मुस्कराए मगर उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने झाड़-पोंछ कर गांधीजी की तस्वीर सँभाल कर बक्से में रख दी थी। फिर बक्से से निकाल कर अपने मुकदमे के कागजात देखने लगे। दरअसल उनकी सारी जिंदगी मुकदमेबाजी में ही गुजरी थी। मुझे याद है कि जब भी वे किसी मुकदमे के सिलसिले में कचहरी जाते तो धोती पर झक्क सफेद कुर्ता पहनते थे। सिर पर उनके बाल भी नहीं थे सो बिल्कुल गांधी की तरह ही लगते। जीवन में एक बार उनकी गांधीजी से उनकी मुलाकात भी हुई थी और देश की आजादी के लिए उन्होंने अपने भूत गांधीजी को सौंपने की पेशकश भी की थी। यह एक दिलचस्प किस्सा है जो नाना ने खुद उस दिन मुझे बताया था।

यह सन 42 के आसपास की बात होगी। नाना की उम्र उस समय बीस-इक्कीस साल रही होगी। गांधीजी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दे दिया था। नाविक विद्रोह हो चुका था। द्वितीय विश्वयुद्ध भी समाप्ति पर था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज के हौसले भी बुलंद थे और वह बर्मा के रास्ते भारत में घुसने की कोशिश कर रही थी। उधर हिंटलर का अंत हो गया था और मित्र देशों की सेनाएँ विजयोल्लास में मस्त थीं। हिरोशिमा और नागासाकी में अमेरिका ने परमाणु बम फेंक कर जापान की कमर तोड़ दी थी। हालाँकि मित्र देशों की सेनाएँ जीत गई थीं लेकिन इंग्लैंड को इससे खासा नुकसान उठाना पड़ा था और जिस ब्रिटिश शासन में सूरज कभी डूबता नहीं था, उसका सूरज अब धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर जा रहा था।

ऐसे ही समय में नाना सुल्तानपुर के एक छोटे से गाँव में अपने भूत-प्रेतों के साथ तंत्र-मंत्र में जुटे थे। भूतों के साथ उनका एक अजीब रिश्ता था। जैसे हम कुत्ते पालते हैं तो उन्हें खिलाना-पिलाना पड़ता है और उनकी देखभाल भी करनी पड़ती है, उसी तरह नाना को भी अपने पाले हुए भूतों की खाना-खुराकी उठानी पड़ती थी। इसके लिए उन्होंने एक रास्ता निकाला था। गाँव के किसी भी बड़े आदमी या औरत पर हफ्ते दो हफ्ते में वे अपना एक भूत छोड़ देते। कुछ दिन वह भूत उन लोगों को परेशान करता। हार कर उसके परिवार वाले नाना के पास आते और उन्हें 'भूत छुड़ाई' देते। नाना एक छोटा-सा अनुष्ठान करते और वह भूत उन्हें छोड़ कर नाना के पास वापस आ जाता। इस तरह भूतों का खर्चा-पानी भी चल रहा था और नाना का अपना काम भी। लेकिन कुछ भूत उद्दंड किस्म के थे और खुदमुख्तार भी। वे बिना नाना की इजाजत के भी किसी गरीब आदमी या औरत पर आ जाते। तब नाना को बड़ा गुस्सा आता। वे बिना कोई 'भूत छुड़ाई' लिए उस गरीब आदमी या औरत पर से भूत उतारते और उस भूत को कड़ा दंड देते।

अपने पाले हुए भूतों के कारण नाना की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी और लोग उनसे डरने भी लगे थे। दूर-दूर से लोग भूत छुड़वाने उनके पास आते थे। नाना ज्योतिष भी जानते थे और सिर्फ माथे की रेखाएँ देख कर वे किसी का भी भूत-भविष्य बता देते।

नाना ने बताया था कि एक बार वे किसी मुकदमे के सिलसिले में सुल्तानपुर जिला कचहरी गए थे। वहाँ एक अखबार में उन्होंने गांधीजी का फोटो देखा था। फोटो में गांधीजी का माथा देख कर ही उन्होंने जान लिया था कि ये साधारण नहीं, कोई अवतारी पुरुष हैं। बस तभी से नाना गांधीजी के भक्त हो गए।

सुल्तानपुर में भी गांधीजी के आंदोलन का प्रभाव था। सुबह-सुबह प्रभातफेरियाँ निकाली जातीं और 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा बुलंद किया जाता। पं. रामनरेश त्रिपाठी तब सुल्तानपुर में कांग्रेस के बड़े नेता थे। गांधीजी का आंदोलन यहाँ उन्हीं के नेतृत्व में चल रहा था। गांधी के त्याग, तपस्या, समर्पण और सत्याग्रह का नाना पर गहरा प्रभाव पड़ा।

गाँव लौट कर नाना ने अपने भूतों के जरिए गांधीजी के जीवन का पूरा इतिहास पता कर लिया। उन दिनों गांधीजी दिल्ली में इक्कीस दिनों के अनशन पर बैठे थे। नाना ने तय किया कि वे गांधीजी से मिलने दिल्ली जाएँगे और बस, उन्होंने अपना सीधा-पानी, लोटा-गठरी उठाई और लाठी ले कर पैदल ही चल पड़े दिल्ली की ओर।

कोई पंद्रह दिनों की पैदल यात्रा के बाद नाना दिल्ली पहुँचे थे। उन दिनों गांधीजी दिल्ली के बिड़ला हाउस में ठहरे थे। तब दिल्ली इतनी बड़ी और चकाचौंध से भरी हुई नहीं थी। फिर भी नाना दिल्ली की भव्यता देख कर भौंचक थे। जैसे-तैसे करके नाना दिल्ली के बिड़ला हाउस पहुँचे। वहाँ भारी भीड़ थी और नाना किसी को जानते तक नहीं थे। नाना ने कई लोगों से गांधीजी के बारे में पूछताछ की और बताया कि वे उनसे मिलने सुल्तानपुर से पैदल चले आ रहे हैं। लोगों को उनकी इस गांधी भक्ति पर आश्चर्य हो रहा था। कांग्रेस सेवादल के कुछ लोगों ने उनसे पूछा कि वे गांधीजी से क्यों मिलना चाहते हैं? तब नाना ने उन्हें बताया कि वे भूत पालते हैं और अपने भूतों को आजादी की लड़ाई में लगाना चाहते हैं और इसके लिए गांधीजी का आशीर्वाद चाहिए। कांग्रेस सेवादल के लोग नाना की इस बात पर खूब हँसे थे, लेकिन नाना ने जब उनकी खूब चिरौरी की तो वे उन्हें गांधीजी से मिलवाने को राजी हो गए। गांधीजी रोज सुबह और शाम प्रार्थना सभा में आते और सभी से मिलते। नाना को भी एक रोज सुबह प्रार्थना सभा में ही गांधीजी से मिलने का मौका मिला था।

नाना आजीवन उस क्षण को कभी भूल नहीं पाए।

प्रार्थना सभा में भारी भीड़ थी। नाना सुबह सूरज उगने से पहले ही वहाँ पहुँच गए थे। बल्कि सच तो यह है कि वह रातभर वहीं आसपास ही घूमते रहे थे। भीड़ में वे सबसे आगे थे। गांधीजी दो लड़कियों के सहारे प्रार्थना सभा में आए और हाथ जोड़ कर मंच पर बैठ गए। भजन चल रहा था -

रघुपति राघव राजा राम

पतित पावन सीताराम

और

वैष्णव जन तो तेणे कहिए

जे पीर पराई जाणे रे।

नाना भक्ति भाव से भौंचक सब सुन रहे थे। प्रार्थना सभा खत्म होने के बाद अपनी टूटी-फूटी हिंदी में गांधीजी ने एक छोटा-सा प्रवचन भी दिया था। कहीं कोई आडंबर या दुराव-छिपाव नहीं। नाना ने जीवन में पहली बार कोई ऐसा महात्मा देखा था। वैसे कई पहुँचे हुए संतों-फकीरों से उनका याराना था लेकिन ऐसा फकीर उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।

प्रवचन के बाद गांधीजी लोगों के सवालों के जवाब देने लगे। नाना भी बोलने के लिए खड़े हुए। लेकिन भीड़ के सामने उनकी आवाज ही नहीं निकली। कांग्रेस सेवादल के लोगों ने उन्हें जबरन बैठा दिया। गांधीजी ने अपनी घड़ी देखी और उठ कर जाने लगे। उन्हें भीड़ ने घेर रखा था। नाना को लगा कि अगर आज वे मौका गवाँ देंगे तो फिर कभी गांधीजी से अपनी बात नहीं कह पाएँगे। वे तेजी से उठे और भीड़ चीर कर गांधीजी के पास पहुँच गए। पहले उन्होंने गांधीजी के पैर छुए और बताया कि वे सुल्तानपुर से पैदल चल कर उनसे मिलने दिल्ली आए हैं। गांधीजी ने भर नजर उन्हें देखा और अचानक ठिठक कर खड़े हो गए। गांधीजी ने स्नेह से अपना हाथ नाना के सिर पर फेरा और आने का कारण पूछा। नाना ने सारी बात बता दी और कहा कि आप ये भूखे मरना छोड़ दीजिए। मेरे पास भूत हैं, मैं उन्हें अंग्रेजों पर छोड़ दूँगा और फिर देखना सारे अंग्रेज देश छोड़ कर भाग जाएँगे।

नाना की बात सुन कर गांधीजी धीरे से मुस्कराए और बोले, मैं भूत-प्रेतों में विश्वास नहीं करता। लेकिन अगर तुम करते हो तो मैं तुम्हारे विश्वास का सम्मान करता हूँ। हालाँकि मैं यही कहूँगा कि तुम इन भूत-प्रेतों का चक्कर छोड़ कर देशसेवा का व्रत लो और ब्रह्मचर्य का पालन करो। ब्रह्मचर्य में बड़ी शक्ति है।

नाना ने फिर एक बार उनके पैर छुए और आशीर्वाद माँगा। गांधीजी ने फिर उनके सिर पर हाथ फेरा और शिष्यों के साथ धीरे-धीरे वहाँ से चले गए। नाना हतप्रभ खड़े उन्हें वहाँ से जाता देखते रहे। बहुत देर बाद उन्हें होश आया और वे वापस चल पड़े।

उस समय तक नाना के तीन-चार बच्चे हो चुके थे। उन दिनों शादियाँ बहुत बचपन में ही हो जाती थीं। उनकी भी हो गई थी। खैर... नाना ने उस दिन से संकल्प लिया कि अब वे बह्मचर्य का पालन करेंगे और नानी की तरफ देखेंगे भी नहीं।

नाना के इस संकल्प के चलते नानी को बहुत कुछ भुगतना पड़ा। गांधीजी के कहने से नाना ने ब्रह्मचर्य का संकल्प तो ले लिया था, लेकिन भूत-प्रेतों का चक्कर नहीं छोड़ा था। बल्कि अब इन भूत-प्रेतों को उन्होंने अंग्रेजों को देश से खदेड़ने के काम में लगा दिया था। अंग्रेजों की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण पड़ती जा रही थी और कांग्रेस का आंदोलन मजबूती पकड़ता जा रहा था। लगने लगा था कि अब अंग्रेज इस देश को हमेशा के लिए छोड़ ही देंगे। नाना जब यह सब सुनते तो उन्हें बड़ी खुशी होती और अपने भूतों की ताकत पर उन्हें भरोसा होने लगता। लेकिन जैसा कि पहले भी कहा कि नाना के सारे भूत उनके अपने नियंत्रण में नहीं थे। कई भूत उद्दंड और खुदमुख्तार भी थे।

उन दिनों देश में सांप्रदायिक दंगे भी शुरू हो गए थे और मुस्लिम लीग की तरफ से पाकिस्तान की माँग भी जोर पकड़ने लगी थी। नाना को लगता कि यह उनके उद्दंड भूतों की ही करामात है। वे उन्हें रोज दंड देते और उन्हें भूखा रखते। लेकिन देश के हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे थे। आखिरकार 15 अगस्त, 1946 को देश आजाद हो गया और साथ ही देश का विभाजन भी। नाना को अपने भूतों पर गर्व था और दुख भी। उन्हें लगता कि अगर उनके कुछ भूतों ने उन्हें धोखा नहीं दिया होता तो देश का विभाजन नहीं होता। खैर... जो हुआ सो हुआ। इस बीच कश्मीर की तरफ कबायलियों की घुसपैठ शुरू हो गई और उधर बिहार, पंजाब और नोआखोली में दंगे। गांधी अकेले इन सबसे जूझ रहे थे।

गांधीजी ने शांति बहाली के लिए फिर एक बार आमरण अनशन शुरू कर दिया था। इस बार उनके साथ कोई नहीं था सिवाय नाना के भूतों के। इधर नाना अपने उद्दंड और खुदमुख्तार भूतों से दुखी थे और उन्हें दंडित करने के लिए तरह-तरह के अनुष्ठान कर रहे थे। मगर पता नहीं क्या था कि नाना के कुछ भूतों ने उनसे विद्रोह कर दिया था और उनकी कोई भी बात मानने को तैयार नहीं थे।

देश आजाद जरूर हो गया था लेकिन कहीं भी कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था। इसी बीच 31 जनवरी, 1947 का वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन भी आया जब दिल्ली की एक प्रार्थना सभा में गांधीजी की हत्या कर दी गई। गाँव के एक लंबरदार के यहाँ नाना को गांधीजी की इस हत्या की खबर मिली। खबर सुन कर नाना जैसे चेतनाशून्य हो गए थे और लाठी उठा कर बखरी के अपने अँधेरे एकांत में जा घुसे।

तीन दिन तक उनका किसी को कुछ पता नहीं चला। वे बखरी के अपने उस एकांत से बाहर ही नहीं निकले। तीन दिन बाद जब वे बाहर आए तो उनके चेहरे पर एक अपूर्व शांति थी।

इसके बाद से जैसे भूतों से उनका कोई रिश्ता ही नहीं रह गया था। न तो गाँव में उन्होंने फिर किसी पर भूत छोड़ा और न किसी से 'भूत छुड़ाई' ली। लेकिन भूतों ने उनका साथ तब भी नहीं छोड़ा था। अब गाँव में ही नहीं, घर में भी लोगों पर भूत चढ़ आता, लेकिन नाना इस सबसे निर्लिप्त रहते। अब लंबरदार के घर जा कर उन्होंने देश-दुनिया की खबरें सुनना भी बंद कर दिया था। उनका अधिकतर समय बखरी के अपने एकांत में ही बीता करता था।

उस दिन नाना ने ये सारी बातें मुझे किसी दूसरे के साथ बीती हुई कहानी की तरह सुनाई थीं और बक्सा बंद करके उस पर ताला लगा दिया।

इंदिरा गांधी तब देश की प्रधानमंत्री थीं और हम लोग बहुत छोटे थे।

गांधी के बाद अगर नाना किसी को पसंद करते थे तो वे जवाहरलाल नेहरू। इंदिरा गांधी के बारे में उनकी राय कोई बहुत अच्छी नहीं थी। कहते, जब कोई राँड़ देश और घर की शासक हो जाय तो समझो बंटाधार है।

हालाँकि बहुत बाद में मामा की मौत के बाद मामी विधवा हो गईं और एक तरह से घर की शासक भी उन्हें नाना ही बनाया। लेकिन घर की भीत तभी से कमजोर होनी भी शुरू हो गई थी। मामा की मौत कैसे हुई, यह आज तक एक रहस्य है। इसके बारे में नाना ही ठीक-ठीक जानते थे। लेकिन नाना ने इस बारे में कभी किसी को कुछ नहीं बताया। मामा की मौत एक सड़क दुघर्टना में हुई थी। तब हम लोग बहुत छोटे थे और मुझे उनकी बस एक धुँधली-सी ही स्मृति है। एक धुँधली-सी छाया जिसमें रात के अँधेरे में मैं मामा की साइकिल पर बैठ कर घर की तरफ जा रहा हूँ। बहुत कोशिश करने पर भी अब मुझे मामा का चेहरा याद नहीं आता। कादीपुर में मामा की साइकिल की एक दुकान थी। लेकिन लोग कहते हैं कि उनका असली धंधा कुछ और था। दरअसल वे नेपाल के रास्ते गाँजे और अफीम की तस्करी करते थे। महज पैंतीस-चालीस साल की उम्र थी उनकी और इसी उम्र में वे लाखों में खेलने लगे थे। जब तक वे जिंदा रहे, घर में पैसों की कोई कमी नहीं रही। सब अच्छा खाते-पहनते। उनकी शाही जीवनशैली देख कर गाँव के तमाम लोग उनसे जलते भी रहते और परेशान करने के लिए तमाम तरह के खुरपेंच करते।

मामा ने मामी और अपनी बेटियों के लिए तमाम गहने भी बनवा रखे थे। खेत में एक ट्यूबवेल भी लगवा दिया था। तब गाँव में एक-दो लोगों के पास ही ट्यूबवेल था। शायद एक ट्रैक्टर भी खरीदने वाले थे कि अचानक उनकी मौत हो गई। शायद उन्हें अपनी मौत का अंदेशा पहले से था इसीलिए मौत से कुछ दिन पहले बच्चों के लिए ढेर सारे कपड़े, खिलौने और राशन-पानी जमा कर दिया था जो अगले कुछ सालों तक चलनेवाला था।

माँ बताती हैं कि मामा की मौत का अंदेशा नाना को भी जरूर था क्योंकि नाना एक पहुँचे हुए ज्योतिषी थे। इस बात का प्रमाण इससे भी मिलता है कि जिस दिन मामा की मौत हुई उस दिन नाना ने उन्हें घर से निकलने को मना किया था। लेकिन मामा नहीं माने। सुबह रोज की तरह वे उठे, नहाया-धोया, पूजा-पाठ किया, खा-पी कर बच्चों को ढेर सारा प्यार किया और साइकिल ले कर घर से निकल पड़े। अभी वे घर से एक किलोमीटर दूर भी नहीं पहुँचे थे कि दूसरी तरफ से आ रहे एक ट्रक ने उन्हें बुरी तरह कुचल दिया। मौका-ए-वारदात पर ही तत्काल उनकी मौत हो गई। पुलिस ने इसे सड़क दुघर्टना का रूप दे कर मामले को रफा-दफा कर दिया, लेकिन घर में कोई भी इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि यह एक दुघर्टना थी।

कहनेवाले तो यहाँ तक कहते हैं कि तस्करी के धंधे में हुई दुश्मनी ही उनकी मौत या हत्या का कारण बनी थी। किसी ने बाकायदा सुपारी दे कर उनकी हत्या करवाई और हत्यारा कभी पकड़ा नहीं जा सका। नाना ने भी इस मामले में ज्यादा भागदौड़ नहीं की। बहरहाल, मामा की मौत के बाद अब घर में नाना के अलावा कोई भी पुरुष नहीं रह गया था।

घर में 35 साल की विधवा मामी थीं। नानी थीं। मौसी थीं और मामी की तीन लड़कियाँ थीं जिनमें से एक से हमें प्यार हो गया था। अब ठीक-ठीक याद नहीं कि पहले प्यार मुझे हुआ था या उसे। प्यार तो मुझे तीनों लड़कियों से था लेकिन शायद उनमें से एक को मुझसे खास प्यार था। हम लोग सुबह-सुबह गोरू चराने जाते। तब नाना के घर में ढेर सारी गाय-भैंसे होती थीं। दो झबरा बैल थे। दूध इतना होता कि पीते नहीं बनता। नाना के घर में नियम था कि दूध बेचा नहीं जाएगा। मैं शरीर से कमजोर था इसलिए मुझे ज्यादा दूध दिया जाता। लड़कियों को दूध नहीं दिया जाता था। दूध पर सिर्फ लड़कों का ही अधिकार था। दूध को पहले मिट्टी की लाल मटकी में घंटों उबाला जाता। फिर जब वह लाल हो जाता और उस पर मोटी लाल मलाई पड़ जाती तब वह पीने को मिलता। ऐसा स्वादिष्ट दूध फिर मैंने जीवन में कभी नहीं पिया। नाना के घर में दूध, रोटी, घी और दाल ही ज्यादा मिलती थी। सब्जी कभी-कभार। दरअसल नाना के खेतों में दाल ही ज्यादा होती थी।

बरसों से नाना ने चूँकि नानी की तरफ देखना बंद कर दिया था इसलिए घर के बाकी लोगों ने भी उन्हें उपेक्षित करना शुरू कर दिया था। घर की असली मालकिन अब 35 साल की विधवा मामी थीं। लेकिन मामी पर भी अब कभी-कभार रह-रह कर भुतहा दौरे पड़ने लगे थे। लोगों का कहना था कि यह दरअसल अकाल मृत्यु को प्राप्त मामा का ही भूत है जो रह-रह कर मामी पर आता है। हालाँकि नानी इसके लिए नाना के पाले हुए भूतों को ही दोष देतीं और नाना को सरापतीं। हालाँकि पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि यह घर में नानी और मामी के वर्चस्व की लड़ाई थी जिसमें मामी ने भूत का इस्तेमाल किया था और घर पर अपना कब्जा जमा लिया था। या क्या पता यह मामी की अपनी दैहिक जरूरतों का ही प्रतिफल हो जिसने भूत के बहाने अपनी इच्छाओं को उघाड़ना शुरू कर दिया था। जो हो... लेकिन घर की माली हालत अब लगातार खराब होती जा रही थी और नाना ने भी अब उस पर ध्यान देना बंद कर दिया था।

नाना ने भूतों का साधना बंद क्या किया, घर में आए दिन लोगों को अब भूत दिखाई देने लगे थे। लोग अब दिन-दहाड़े भी अकेले कोठरी में घुसने से डरने लगे थे। जाने कब, कहाँ, किसको, कौन सा भूत दिखाई दे जाय।

पापा उन दिनों ट्रांसफर हो गए थे। माँ अपने ससुराल में थीं और मैं ननिहाल में पड़ा था। दरअसल, ननिहाल मुझे ज्यादा प्यारा था क्योंकि यहाँ प्यार था। मामी, नानी, मौसी सब मुझे बहुत प्यार करते थे। मौसी रोज सुबह मुझे नहलाने कुएँ पर ले जातीं। कुआँ एक बाग में था। बाग में बहुत सारे आम के पेड़ थे। मौसी ढेले से आम तोड़-तोड़ कर मुझे खिलातीं, फिर कुएँ से पानी खींच कर नहलातीं। बाद में मौसी की शादी हो गई और वे अपनी ससुराल में कैद कर ली गईं।

बहुत बाद में जब मैं उसी जिले के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था, एक लड़का मुझसे मिलने आया। उसने मुझे एक पोटली दी और कहा कि यह तुम्हारी मौसी ने तुम्हारे लिए भेजा है। मैंने पोटली खोली। उसमें बच्चों का एक मोजा था जिसमें सिक्के भरे हुए थे। यकीनन यह मौसी के किसी बच्चे का फेंका हुआ मोजा था जिसमें मौसी ने अपने बचाए हुए पैसे रखे थे। एक-एक दो-दो रुपए के सिक्के। कुल मिला कर सौ-दो सौ रुपए रहे होंगे।

तीन-चार बच्चे पैदा कर मेरी सुंदर मौसी सूख कर काँटा हो गई थीं। लेकिन मेरे लिए उनका प्यार अब भी वैसा ही था। उस दिन उस मोजे को देख कर मैं बहुत भावुक हो गया था। कहते हैं कि नाना का छोड़ा हुआ भूत कभी-कभी मौसी पर भी आता था। मौसी पर जब वह भूत आता तो मौसी एकदम सच-सच बोलने लगतीं। ऐसे ही किसी समय उन्होंने मौसा के अवैध संबंधों का किस्सा सबके सामने कह सुनाया था और बहुत मार खाई थी। मौसी पर जब भूत आता तो वह एकदम चंडी बन जातीं। बाल बिखरा लेतीं। आँखें लाल और मुँह से घुर्र-घुर्र की आवाज करने लगतीं। दरअसल मौसी अपने मायके में बहुत लाड़-प्यार से पली थीं। सबसे छोटी थीं इसलिए उनकी शरारतों पर भी कभी कोई उनसे कुछ नहीं कहता था। मौसी जो अपने मायके में दिन भर गाँव भर में कुलाँचे भरा करती थीं, ससुराल आ कर घर में बँध गईं। बस, सुबह टट्टी-फरागत के लिए उन्हें घर से बाहर जाने की छूट थी क्योंकि तब तक मौसा के यहाँ क्या खुद हमारे यहाँ भी लैट्रिन नहीं बनी थीं। दरअसल, उन दिनों घरों में पक्की लैट्रिन को सबसे फालतू की चीज माना जाता था। घर में सब होता-बरामदा, रसोई, कई-कई कमरे, जानवरों के लिए अलग बखरी, लेकिन नहीं होती तो पक्की लैट्रिन। पक्की लैट्रिन न होने से पुरुषों को तो कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि वे जब चाहते खेतों में चले जाते। लेकिन महिलाओं की जान को साँसत थी। उन्हें सुबह चार बजे ही अँधेरे में उठना पड़ता और खेतों की ओर भागना पड़ता। पता नहीं दिन में महिलाओं को हाजत लगती भी या नहीं क्योंकि दिन में मैंने कभी उन्हें खेतों की ओर जाते नहीं देखा। हाँ, पेशाब के लिए जरूर घर के सबसे खराब कमरे से एक मोरी निकाल दी जाती जिससे वे अपना निपटान कर लें। तो मौसी के घर में भी तब लैट्रिन नहीं थीं और एक बार उन्हें दस्त लग आए थे। किसी औरत को दस्त लगने की बात गाँव में विश्वास-योग्य नहीं मानी जाती थी। माना जाता था कि ये कोई ऊपरी बाधा है जिसका इलाज पंडित-ओझा के पास ही है। तो मौसी को दस्त लगे तो ओझा बुलाया गया। इधर मौसी की हालत खराब से खराब होती जा रही थी और उधर ओझा दुनियाभर के टोटके कर रहा था। ऐसे ही समय मौसी पर चंडी सवार हुई और उन्होंने ओझा को धर पटका। ऐसा करते समय उनके दस्त निकल गए और पूरे घर में मार गंध फैल गई। इसके बाद तो मौसा और मौसी की सास ने मिल कर मौसी की जो कुटम्मस की कि कई दिनों तक उन्हें हल्दी-दूध पीना पड़ा।

मौसी के बारे में एक किस्सा और प्रचलित है। वह है उनके प्रेम-प्रसंग का। अब पता नहीं यह कितना सच है, फिर भी जुड़ा चूँकि यह नाना के भूतों के किस्सों से ही है इसलिए इसका भी जिक्र जरूरी है। मौसी की ससुराल में एक हलवाहा था। हलवाहा बूढ़ा था इसलिए उसने अपना काम अपने बेटे को सौंप दिया था। हलवाहे के बेटे का घर में काफी आना-जाना था। होता ही है। घर का काम करने वाले घर में बेरोकटोक आते ही रहते हैं। इसमें अस्वाभाविक भी कुछ नहीं है। लेकिन जाने कब और कैसे हुआ कि उसकी नजर मौसी पर पड़ गई। मौसी सुंदर तो थी हीं और घर में दुखी भी। औरत सुंदर हो और दुखी हो तो दुनिया की बुरी नजर उस पर रहती ही है। हालाँकि यह कोई नियम नहीं है। (वैसे नियम तो किसी भी चीज का भी नहीं होता जैसे किसी कहानी का कोई नियम नहीं होता।) इसलिए औरत सुंदर न भी हो और सिर्फ औरत ही हो तो भी दुनिया की बुरी नजर उस पर रहती है। लेकिन यहाँ मौसी सुंदर भी थीं और दुखी भी। हलवाहे की नजर उन पर पड़ी तो उसका घर में आना-जाना बढ़ गया। हलवाहे ने मौसी के दुख को देखा तो उसका सीना चाक हो गया। उसने उस दुख पर मलहम लगाने की सोची। अब मलहम तो गाँव में मिलता नहीं था। उसके लिए शहर जाना पड़ता। इसलिए उसने मौसी के दुख पर अपने हाथों का ही मलहम लगाना शुरू कर दिया। जैसे ही मौसी के दुख पर हलवाहे के हाथों का मलहम लगा, मौसी को जूड़ी चढ़ गई। वे बुरी तरह काँपने लगीं। इससे पहले कि पूरी तरह भहरा कर गिर ही जातीं, हलवाहे ने उन्हें सँभाल लिया और अपने होठों से मलहम लगाना शुरू कर दिया। उसके ऐसा करने पर मौसी के दिल को ठंडक पहुँची। फिर तो लगभग रोज ही ऐसा होने लगा। बताते हैं कि मौसी भी उन दिनों बहुत खुश-खुश रहने लगी थीं। सुबह जल्दी गुनगुनाते हुए उठतीं। खेतों में निबटान को जातीं। घर आतीं। नहाती-धोतीं। घर की साफ-सफाई, लीपा-पोती, चौका-बासन सब बड़े मनोयोग से करने लगी थीं। अपने देवरों से उनकी हँसी-ठिठोली भी उन दिनों बढ़ गई थी। फिर एक दिन खबर आई कि मौसी ने आत्महत्या कर ली। अब यह आत्महत्या थी कि हत्या-यह आज तक रहस्य है। क्योंकि उस दिन मौसा शहर सुल्तानपुर गए थे कोर्ट-कचहरी के काम से। जिस दिन मौसा शहर सुल्तानपुर में थे ठीक उसी दिन मौसी ने भी आत्महत्या की थी। यह घटना आज तक रहस्य इसलिए भी बनी हुई है कि मौसी की देह का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया था और रातोंरात उन्हें फूँक-ताप दिया गया था। अब तो यह भगवान ही जानता है कि यह सब कैसे और क्यों हुआ? लेकिन हाँ, एक बात मैं जानता हूँ कि मौसा मौसी को बहुत चाहते थे और इसका प्रमाण यह कि मौसी की मौत के बाद मौसा ने फिर शादी नहीं की। कई दिनों तक तो दुनिया-जहान से बेपरवाह तक रहे। फिर धीरे-धीरे इस दुनिया में लौटे। मैं जब भी मौसी की हत्या या आत्महत्या की बात याद करता हूँ तो मुझे मोजे में भेजे गए पैसों की बेतरह याद आती है जो आड़े वक्त में मेरे बहुत काम आए थे।

बहुत बाद में शहर में मौसा ने एक दिन मेरे साथ शराब पी थी और मौसी को ले कर बहुत दुखी हुए थे। हम छत पर बैठे पी रहे थे। मैं मौसी और अपने बचपन की बात कर रहा था। मैंने जानबूझ कर मोजेवाला किस्सा उनसे छुपा रखा था, लेकिन मौसा की आँखें गीली थीं और वे पश्चाताप में डूबे हुए थे। खैर... नाना के घर में मामी की तीन लड़कियाँ थीं और तीनों से मुझे प्यार था। उम्र में तीनों मुझसे बड़ी थीं। मुझे सबसे बड़ीवाली ज्योति ज्यादा अच्छी लगती लेकिन जान सबसे छोटीवाली मीनू मुझ पर देती थी। सबसे बड़ीवाली ज्योति की उम्र रही होगी सत्तरह-अट्ठारह साल। सबसे छोटी मीनू तेरह-चौदह साल की थी। मैं भी रहा होऊँगा आठ-दस साल का। हम लोग रोज सुबह स्कूल पढ़ने और गोरू चराने जाते थे। हमारा गोरू चराना और स्कूल पढ़ना एक साथ होता था।

यह स्कूल भी क्या था... एक खंडहर था। दो-तीन कमरों का एक टूटा-फूटा-सा खंडहर जिसमें अक्सर रात में गाँव के बच्चे टट्टी-पेशाब कर जाते और सुबह हमीं लोगों को फावड़े से उसे साफ करना पड़ता। इस स्कूली खंडहरों में न दरवाजे थे न खिड़कियों पर जालियाँ। बरसात में तो छत भी टपकती रहती थी। स्कूल में मात्र दो अध्यापक थे जिन्हें हम पंडिज्जी कह कर पुकारते हालाँकि उनमें से एक तो जाति का पासी था, लेकिन हमारे लिए तो हर अध्यापक ही पंडिज्जी थे। दोनों अध्यापक बारी-बारी से स्कूल आया करते थे। कक्षा एक से आठ तक की जिम्मेदारी इन्हीं दो अध्यापकों के भरोसे थी। स्कूल एक ऐसी जगह था जिसके चारों ओर बड़े-बड़े टीले और गड़हे थे। जंगल था और झाड़ियाँ जिनमें हाथी भी छिप जाय तो पता न चले।

अक्सर तो हम लोग स्कूल के बाहर खड़े आम के पेड़ के नीचे ही पढ़ते थे। हमारी एक नजर स्कूल की पढ़ाई पर रहती तो दूसरी अपने-अपने गोरुओं पर। बड़े पंडिज्जी बड़े कड़क स्वभाव के थे। अक्सर छोटी-छोटी बातों पर बच्चों को इतना पीटते कि शरीर पर नील के निशान पड़ जाते। स्कूल में सबसे जरूरी काम हाजिरी रजिस्टर में अपनी हाजिरी दर्ज करवाना होता था। इसके बाद पढ़ाते-पढ़ाते पंडिज्जी अक्सर सो जाते और हम जंगल में रफूचक्कर।

मामी की बड़ीवाली लड़की ज्योति स्कूल में पढ़ती नहीं थी। वह हमारे साथ सिर्फ गोरू चराने आती थी और अक्सर हमारे ही साथ स्कूल में बैठी रहती। सतरह-अट्ठारह साल की उम्र थी उसकी। शादी तय हो गई थी। हम लोग आस-पास के खेतों से चना-चबैना चुरा लेते और टीले पर बैठ कर आराम से खाते। गोमती के किनारे का बड़ा ही बंजर-सा इलाका था वह जहाँ आस-पास कोई नहीं आता था। बारह-तेरह साल की उम्र थी मेरी और उन दिनों भी मैं आज की तरह ही हरदम बेचैन और परेशान-सा रहा करता था। अक्सर टीलों के एकांत में जा कर जोर-जोर से चीखता-चिल्लाता और रोता। माँ आस-पास नहीं थीं तब और मुझे माँ की बहुत याद आती। मैं माँ की गोद में जा कर सो जाना चाहता था।

उस दिन भी मैं ऐसे ही बेचैन और परेशान था। स्कूल से भाग कर टीलों के एकांत में रो रहा था। ज्योति ने मुझे अकेले में रोते हुए देख लिया था। वह मेरे पास आ गई थी और मुझे अपनी गोद में भर लिया था। मुझे नहीं पता था कि मैं क्यों रो रहा हूँ और शायद उसे भी नहीं पता था कि वह मुझे क्यों प्यार कर रही है।

उस दिन उसने मुझे बेतरह चूमा था। मैंने भी उसके तमाम खूबसूरत कुँवारे उभारों को प्यार से सहलाया था। वे उभार उसके लिए किसी फोड़े की तरह थे जिन पर मैंने अपने हाथों से मलहम लगाया था। मामी की सबसे छोटीवाली लड़की मीनू ने मुझे ऐसा करते हुए देख लिया था और तभी से उस पर भूत आने लगा था। हालाँकि उस बात को उसने किसी को नहीं बताया था, लेकिन उस दिन के बाद वह मेरे आस-पास ज्यादा रहने लगी थी। जब भी उस पर भूत आता तो वह बेतरह चीखने-चिल्लाने लगती। अपने कपड़े फाड़ देती और अपने शरीर के ताजा-ताजा उभारों को नोचने लगती।

एक दिन मैंने देखा कि घर की कच्ची भीत पर खड़िया से उसने अपने नाम के साथ मेरा नाम भी लिख रखा है। मैंने ही नहीं, गाँव के और भी बच्चों ने उसकी यह हरकत देखी थी और मुझे उसका नाम ले-ले कर चिढ़ाने लगे थे। हालाँकि ये भी बाद की बात है। उससे पहले एक दिन रात में मैं खा-पी कर नाना के साथ मचान पर सोने जा रहा था कि अँधेरे रास्ते में ही किसी भूतनी की तरह वह मुझे मिल गई। खुले बाल। वीभत्स चेहरा। मैं डर गया था और जब तक मैं चीखने-चिल्लाने की कोशिश करता, वह मुझ पर हावी हो चुकी थी। उसने मुझे बेतरह चूमा और अपने नुकीले दाँतों से मुझे जगह-जगह काट खाया। मैं संज्ञाशून्य था और बस हाथ-पैर पटक रहा था। उसने अपने शरीर के तमाम उभारों को मेरे शरीर पर रगड़ा और लगातार मुझे चूमती और काटती रही।

वह लगभग पागल हो गई थी और मैं पसीने से तरबतर। मेरी साँसे हँफनी की तरह चल रही थीं। कुछ डर से तो कुछ उत्तेजना से। जैसे ही उसकी पकड़ कुछ ढीली हुई, मैं तेजी से नाना के मचान की तरफ भागा। नाना ने मेरी हालत देखी तो चिंतित हुए। उन्होंने मेरे माथे पर आए पसीने को अपने अँगोछे से पोंछा और मेरी हाँफती हुई साँसों को शांत करने के लिए सिर पर हाथ फेर कर मुझे अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने पूछा था कि आखिर क्या हुआ जो मैं इतना डर गया। उस दिन मैंने उनसे झूठ बोला था और उन्हें कुछ भी साफ-साफ नहीं बताया था। उनके बार-बार पूछने पर मैंने सिर्फ यही कहा था कि रास्ते में मैंने एक भूत देखा। नाना उस भूत की तफ्सील में जाना चाहते थे और उसका पूरा हुलिया पूछ रहे थे। वो भूत था कि चुड़ैल? उसने कैसे कपड़े पहने थे? उसके पैर किधर थे और दिखने में वह कैसा था?

मैंने नाना को कुछ भी नहीं बताया और उनके हर सवाल पर सिर्फ रो दिया। आखिरकार नाना अपने मचान पर मुझे अपनी गोद में ले कर सो गए और कहा कि अब चुपचाप सो जाओ। अब कोई भूत-प्रेत या चुड़ैल तुम्हारे पास नहीं आएँगे। और सचमुच उस रात वहाँ कोई नहीं आया। सपने में भी नहीं।

लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद मामी की सबसे छोटीवाली लड़की मीनू पर भूत आया था और उससे भी पहले खुद मामी पर। दरअसल, मामी की सबसे छोटीवाली लड़की मीनू ने स्कूल की खड़िया से अपने और मेरे बारे में जो कुछ लिखा था उसकी खबर मामी को भी लग गई थी। इस खबर से वे आगबबूला हो गई थीं। उन्होंने गुस्से में मुझे और मीनू को खूब पीटा था। मुझे कम और उसे ज्यादा। उसे तो इतना ज्यादा मारा था कि वह दसियों दिन तक हल्दी-दूध ही पीती रही।

रक्षाबंधन पास ही था और मामी की योजना थी कि अपनी सभी लड़कियों से वे मेरे हाथ पर राखी बँधवाएँगी। राखी का दिन आया। मामी की बड़ीवाली लड़की ज्योति ने खुशी-खुशी मेरे हाथ पर राखी बाँधी। राखी बाँधते समय वह बड़े अजीब ढंग से मुस्कराई थी जिसका अर्थ मुझे कुछ दिन बाद समझ में आया। दरअसल, राखी बाँध कर भी वह मेरे साथ अपने अवैध संबंधों को बनाए रख सकी थी और किसी को शक भी नहीं हुआ था। हम गोरू चराने जाते और टीले के पीछेवाली झाड़ियों में फिर-फिर वही खेल खेलते। लेकिन सबसे छोटीवाली मीनू ऐसा नहीं कर पाई। दरअसल, मेरी उसमें रुचि भी नहीं थी। खैर... मीनू ने मामी के सामने ही मुझे राखी बाँधने से साफ इनकार कर दिया था जिसकी ऐवज में उसने मामी के हाथों बहुत मार खाई, मगर उसने राखी नहीं बाँधी तो नहीं ही बाँधी।

इसके बाद उस पर और भी जल्दी जल्दी भूत आने लगे।

जैसा कि मैंने पहले बताया कि मामी की बड़ीवाली लड़की ज्योति की उम्र उस समय 18-19 साल हो रही थी और उसी समय उसकी शादी सुल्तानपुर के एक निठल्ले वकील सीताराम पाठक के साथ कर दी गई थी जो सिर्फ कहने को ही वकील थे क्योंकि वे सुबह घर से पाँच रुपए ले कर कचहरी जाते और शाम को खाली हाथ लौट आते। उनकी वकालत खाक नहीं चलती थी और वे दिन भर कचहरी में चाय-नाश्ते के लिए मुर्गा फाँसते रहते और गप्प-गोष्ठी करके शाम को घर लौट आते। खैर... यह अजीब बात है कि इस शादी से मुझे बिल्कुल भी दुख नहीं हुआ था। मुझे सचमुच दुख तब हुआ जब मामी की सबसे छोटीवाली लड़की मीनू की शादी तय हुई जिसकी उम्र उस समय सोलह-सतरह साल ही रही होगी। बीचवाली की शादी सबसे बाद में हुई और उस समय मेरी भी उम्र सोलह-सतरह के आस-पास ही थी। जैसा कि मैंने बताया कि मामी की सबसे छोटीवाली लड़की मीनू की शादी सोलह-सतरह साल की उम्र में ही हो गई थी और जब उसकी शादी हुई तो मैं वहाँ नहीं था इसलिए अपनी शादी पर उसकी क्या प्रतिक्रिया थी, मैं नहीं जानता। लेकिन बाद में जो हुआ वह सचमुच दहशतनाक था। दरअसल, लाख कोशिशों के बाद भी भूतों ने नाना का घर नहीं छोड़ा था। मामी की सबसे छोटीवाली लड़की मीनू की शादी जिस घर में हुई थी, वह खासा लालची परिवार था। शादी को छह महीने भी नहीं बीते कि दहेज की माँग शुरू हो गई और लड़की के साथ मार-पीट होने लगी। लड़की लड़ाका भी थी और उस पर गाहे-बगाहे भूत भी आते थे। ये तो बहुत बाद में मुझे पता चला कि उसका पति दरअसल नपुंसक था और इसी कारण वह बहुत परेशान भी रहा करती थी। साल-छह महीना बीतते न बीतते वह ससुराल से हाथ-पैर तुड़वा कर मायके लौट आई फिर कभी न जाने के लिए। इसका ठीकरा भी नाना के भूतों के सिर ही फोड़ा गया। मैं तब वहाँ नहीं था, हाँ इतना जरूर मालूम हुआ कि उसी समय नाना का चेला चेलाराम ग्राम प्रधानी का चुनाव लड़ रहा था। चेलाराम का मेरी इस तथाकथित प्रेम कहानी से क्या संबंध है, कह नहीं सकता, लेकिन चेलाराम का किस्सा भी है मजेदार। चेलाराम दलित समाज से आता था और नाना की चेलाई करता था। उसका असली नाम क्या था, किसी को नहीं मालूम। चूँकि वह नाना का चेला था इसलिए लोग उसे चेलाराम ही कहते और इस तरह उसका नाम ही चेलाराम पड़ गया। वह नाना के भूतों की देखभाल करता और नाना से उन्हें साधने के गुर सीखता। वह बचपन में ही नाना के पास आ गया था और एक तरह से नाना ने ही उसे पाला-पोसा था। जिस समय मामी की सबसे छोटीवाली लड़की की आत्महत्या की खबर आई, उस समय गाँव में प्रधानी के चुनाव होनेवाले थे और गाँव के कुछ उजबक किस्म के लोगों ने चेलाराम को चुनाव में लड़ा दिया था। यह वही समय था जब गाँव के दलित भी थोड़ा-थोड़ा दबंग होने लगे थे और अपने अधिकारों के लिए सजग रहने लगे थे। अनपढ़ चेलाराम को ग्राम प्रधानी से क्या लेना-देना, यह सूचना ही मेरे लिए चौंकानेवाली थी। इससे पहले ग्राम प्रधानी का पद गाँव के सबसे दबंग और इज्जतदार काश्तकार ठाकुर उदयभानु सिंह के परिवार के पास ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा था। लेकिन अब स्थितियाँ बदल चुकी थीं। ग्राम प्रधानी की सीट दलितों के लिए आरक्षित हो चुकी थी और लोगों ने मजाक-मजाक में उस पद के लिए चेलाराम को मैदान में उतार दिया था। संयोग ऐसा रहा कि चुनाव के कुछ ही दिन पहले दलितों के घरों में आग लगी थी और एक साथ दसियों घर जल कर खाक हो गए थे। इस घटना के लिए लोगों ने ठाकुर उदयभानु सिंह के परिवार वालों को जिम्मेवार ठहराया। अब सच तो भगवान ही जाने लेकिन परिणाम यह रहा कि ठाकुर उदयभानु सिंह का आदमी इस चुनाव में हार गया और चेलाराम ने बाजी मार ली।

चुनाव से कुछ ही दिन पहले चेलाराम नाना के पास आया था और उनसे वोट और आशीर्वाद माँगा था। चेलाराम चूँकि नाना का चेला रह चुका था इसलिए उन्होंने उसे आशीर्वाद तो दिया लेकिन उसे वोट देने से साफ इनकार कर दिया था।

पता नहीं क्यों लेकिन उनका मानना था कि चेलाराम इस चुनाव में धूर्तविद्या का इस्तेमाल कर रहा है। ठाकुर उदयभानु सिंह नाना के जजमान थे और नाना उनके खिलाफ जा नहीं सकते थे। इसलिए चेलाराम और उसके लोगों ने गाँव में यह अफवाह फैलाई कि दलितों के घरों में आग ठाकुर उदयभानु सिंह की तरफ से नाना के भूतों ने लगाई है और चूँकि चेलाराम नाना का चेला था और उनके भूतों के बारे में सब कुछ जानता था इसलिए उसने इस अफवाह की पुष्टि भी कर दी। दावा किया गया कि नाना के इन बदमाश भूतों से सिर्फ चेलाराम ही निपट सकता है इसलिए सबने मिल कर उसी को वोट किया।

बताते हैं कि चुनाव से ठीक पहले चेलाराम ने इस सिलसिले में कोई गुप्त अनुष्ठान भी किया था।

भूत अब सवर्णों के पाले से दलितों के पाले में चले गए थे और चेलाराम चुनाव जीत गया था। इसके कुछ ही दिन बाद नाना की मृत्यु हो गई और माना गया कि चेलाराम का अनुष्ठान सफल रहा। यह सोच कर आज भी आश्चर्य होता है कि एक जमाने का पगला चेलाराम कैसे अपनी धूर्तविद्या में माहिर होता गया और एक-एक कर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता गया। बाद के दिनों में उसकी सफलता और कारनामों की कहानी तो और भी रोमांचक है।

यह चेलाराम के विधायकी का चुनाव लड़ने और जीतने से पहले का किस्सा है। देशभर में रामलहर आई हुई थी और जगह-जगह से कारसेवकों का जत्था बाबरी मस्जिद को गिराने और राममंदिर को बनाने अयोध्या की ओर कूच कर रहा था। मामी की सबसे छोटीवाली लड़की मीनू पर इन दिनों भूतों का आना भी बढ़ गया था जिसका इलाज अब सिर्फ चेलाराम के पास था। चेलाराम चूँकि नाना का चेला था और एक तरह से घर का आदमी था इसलिए बेर-कुबेर कभी भी उसका घर में आना-जाना लगा रहता। इन्हीं दिनों मीनू के साथ उसकी निकटता भी बढ़ी थी। उधर राममंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था, इधर मीनू पर आनेवाले भूतों की आक्रामकता भी कम हो रही थी। लग रहा था कि घर में अब सुख-चैन आने ही वाला है। नाना की मौत के बाद चेलाराम पर मामी की निर्भरता भी बढ़ गई थी। हालाँकि खेती-बारी के तमाम काम तो मामी के बड़े दामाद सीताराम पाठक ही करवाया करते थे, मगर गाँव में चूँकि वे हमेशा रह नहीं सकते थे इसलिए वो सारी जिम्मेदारी भी चेलाराम के ऊपर ही आ गई थी।

घर में मीनू और चेलाराम की नजदीकियाँ इतनी बढ़ गई थीं कि गाँव में उन्हें ले कर अब कानाफूसी भी शुरू हो गई थी। लेकिन चेलाराम का चूँकि दबदबा था इसलिए खुल कर कोई उनके बारे में बोल नहीं पाता था। मामी ने भी एक तरह से आँख-कान बंद कर लिए थे - जाने किस लालच या स्वार्थ में।

सब कुछ ऐसे ही चल रहा था कि एक दिन घर में भूचाल आ गया। मामी सुबह-सुबह उठीं तो पाया कि घर में मीनू नहीं है। सोचा कि दिशा-फरागत को गई होगी, सो चुप मार कर बैठी रहीं। लेकिन जब काफी देर हो गई तो चिंता हुई। सोचा कि कुएँ पर नहाने गई होगी लेकिन जब वहाँ जाने पर भी नहीं मिली तो परेशान हो गईं। फिर सोचा कि शायद नहा कर पूजा के लिए मंदिर गई हो, लेकिन मीनू थी कि मंदिर पर भी नहीं मिली। अब मामी को रोना आने लगा था। उन्होंने पूरा गाँव, खेत-खलिहान खोज मारा, लेकिन मीनू फिर भी नहीं मिली। गाँव में मीनू की जितनी भी सखी-सहेलियाँ थीं किसी को भी मीनू के बारे में कोई खबर नहीं थी। मामी का माथा ठनका। घर आ कर नाना की तिजोरी और अपना बक्सा खँगाला। पाया कि घर से तीन हजार रुपए और कुछ गहने, कपड़े-लत्ते गायब हैं। साफ था कि मीनू घर से भाग गई थी।

मामी अब असहाय हो गई थीं और धाड़े मार-मार कर रो रही थीं। लड़की नाक कटा कर घर से भाग गई है, इस बात की खबर दोपहर होते-होते पूरे गाँव में फैल गई थी। इस समय तक मामी के मुँह में पानी की बूँद तक नहीं गई थी और वे बेहाल थीं।

मामी बार-बार एक ही बात कहतीं कि चेलवा को बुलाओ, लेकिन चेलाराम का कहीं अता-पता नहीं था। गाँव के ही किसी आदमी ने सुल्तानपुर जा कर मामी के बड़ेवाले दामाद सीताराम पाठक को मीनू के गायब होने की खबर दी थी और शाम होते-होते वे भी गाँव आ गए थे।

पाठक जी ने अपने स्तर पर आस-पास के गाँव में मीनू और चेलाराम की खोज-खबर की लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चला। अगले दिन एक इक्केवाले ने बताया कि एक दिन पहले उसने सुबह भर अँधियारे चेलाराम को एक लड़की के साथ कादीपुर की तरफ जाते देखा था। वह चेलाराम को नहीं जानता था। सिर्फ उसका हुलिया जानता था और उसकी गतिविधियाँ उसे संदिग्ध लगी थीं। अब पाठक जी को पक्का यकीन हो गया कि हो न हो मीनू को चेलाराम ने ही अगवा किया है।

पाठक जी ने इसकी रपट कादीपुर जा कर पुलिस थाने में लिखवाई। लेकिन पुलिस चेलाराम को प्रधान जी के रूप में जानती थी और उसे यकीन नहीं हो रहा था कि इस काम में प्रधान जी को भी कोई हाथ हो सकता है। शुरू में दो-चार दिन तक तो पुलिस ने कोई कार्रवाई ही नहीं की और मामले को लगातार टालती रही। लेकिन चार दिन बाद जब पाठक जी पुलिस के बड़े अफसरों के पास फरियाद ले कर गए और थाने पर लगभग धरना ही दे दिया तो पुलिस थोड़ा हरकत में आई। हालाँकि प्रधान जी के खिलाफ तब भी कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। हुआ सिर्फ यह कि गाँव से चेलाराम के दो-तीन दलित साथी उठा लिए गए जो मीनू के गायब होने की रात चेलाराम के साथ मटरगश्ती कर रहे थे।

उनसे भी मीनू के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिली। सिर्फ इतना पता चला कि कि प्रधान जी 'राम-काज' से लखनऊ गए हैं, वहाँ से वे कारसेवकों का जत्था ले कर 'अजुध्या जी' जाएँगे।

प्रधान जी लखनऊ तो गए थे लेकिन 'राम-काज' से नहीं।

चार महीने बाद जब सीताराम पाठक के निजी प्रयासों से मीनू फैजाबाद के एक किराए के घर से बरामद की गई और उसने जो बयान दिया उसके अनुसार पहले चेलाराम उसे ले कर शुरू के दो-चार दिन सुल्तानपुर के ही एक घर में रुका था। चेलाराम ने उससे शादी करने का वादा किया था इसलिए वह उसके साथ रुपए और जेवर ले कर भागी थी। सुल्तानपुर में चेलाराम को उसके दो-तीन साथी और मिल गए थे। सबने मिल कर उसके साथ चार दिन तक बलात्कार किया और फिर उसे ले कर लखनऊ चले आए। लखनऊ में उनकी मुलाकात एक बड़े नेता से हुई जो उन दिनों परम रामभक्त और हिंदुत्व के फायर ब्रांड नेता माने जाते थे। नेताजी भी उसी पिछड़ी जाति से संबंधित थे जिससे चेलाराम। नेताजी चेलाराम की राम-भक्ति से बहुत प्रसन्न थे और उन्होंने मीनू को अपनी सेवा में रख लिया था। मीनू को लखनऊ के ही एक पॉश इलाके में नजरबंद रखा गया और दिनभर राम-काज से थके-हारे नेताजी लगभग रोज ही शाम को अपनी थकान उतारने उसके पास आने लगे। इस बीच मीनू को और भी कई नेताओं की सेवा में भेजा गया। मीनू इन सबके सामने खूब रोई-गिड़गिड़ाई और खुद को चेलाराम के चंगुल से छुड़ा कर घर भिजवाने की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

हालाँकि ये सारी बातें बाद में मीनू के दिये बयान पर आधारित हैं (जो सीताराम पाठक ने चेलाराम के खिलाफ बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस करके कही थीं) इसलिए इनमें कितनी सच्चाई है, कहना मुश्किल है। बहरहाल, चेलाराम इस बीच 'राम-काज' में लगा रहा और महीने भर बाद मीनू को ले कर फैजाबाद चला आया। फैजाबाद में भी उसे एक किराए के मकान में नजरबंद रखा गया।

इधर सीताराम पाठक के प्रयासों से पुलिस पर भी दबाव बढ़ने लगा और पुलिस ने प्रधान चेलाराम को फरार घोषित कर दिया।

अयोध्या में बाबरी मस्जिद टूट गई थी और पूरे देश में खून की होली खेली जा रही थी।

फैजाबाद में मीनू की देख-रेख के लिए एक महाराजिन थी जो हिंदू हृदय सम्राट नेताजी की खास थी और उसका मुख्य काम यही था कि कैसे भी चिड़िया हाथ से नहीं जानी चाहिए। पता नहीं नेताजी के दिमाग में क्या चल रहा था, लेकिन इतना पक्का था कि मीनू उनके लिए बहुत काम की होनेवाली थी। खैर... दो महीने बाद चेलाराम की गाँव वापसी हुई और पुलिस ने उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसने बताया कि इस बीच वह कारसेवा के काम से दिल्ली, लखनऊ और अयोध्या में रहा और मीनू की उसे कोई जानकारी नहीं। परम रामभक्त और हिंदुत्व के फायरब्रांड नेताजी ने भी उसकी बात की तस्दीक की और उनके प्रयासों से शीघ्र चेलाराम की जमानत भी हो गई। इलाके में चेलाराम की नेतागीरी अब चमक गई थी और इस बीच वह हिंदुत्व का एक चमकता हुआ सितारा बन कर उभरा था। मीनू कांड को उसने राम विरोधियों का षड्यंत्र करार दिया और इसके लिए सीताराम पाठक को दोषी बताते हुए उसे विरोधी पार्टियों का एजेंट बताया। हालाँकि मीनू का अब तक कुछ पता नहीं था। उसे गायब हुए अब तक चार महीने बीत चुके थे। नाना के घर से भी चेलाराम के संबंध अब पूरी तरह टूट चुके थे और उसके रहन-सहन में भी इधर भारी बदलाव आ चुका था। झक्क सफेद कुर्ता-पाजामा, रामनामी दुपट्टा ओढ़े, माथे पर लंबा लाल टीका लगाए उसका ज्यादातर समय अब लखनऊ, सुल्तानपुर और कादीपुर में ही बीतता था। इस बीच जाने कहाँ से उसके पास एक अंबेसडर कार भी आ गई थी जिससे इलाके में उसका रुतबा और भी बढ़ गया था। बीडीओ, डीएम, एसडीएम जैसे अफसरों से रब्त-जब्त भी। पैसों की भी कोई कमी नहीं थी। लोग अपने तमाम तरह के कामों के फेहरिश्त लिए उसके आगे-पीछे घूमने लगे। और सचमुच वह उनके कुछ काम कराता भी था। हालाँकि अपनी प्रधानी के दौर में उसने कई बड़े घोटाले किए थे। डेयरी चलाने के नाम पर भैसों के लिए उसने फर्जी लोन लिए। भैंसे सिर्फ कागजों पर ही खरीदी गईं और कुछ समय बाद कागजों पर ही किसी अदृश्य रहस्यमय बीमारी से मर भी गईं। लोन का सारा पैसा पर्यवेक्षक और दूसरे अधिकारियों की मिलीभगत से चेलाराम की जेब में। खैर... अब चेलाराम जमानत पर थे और उनकी नेतीगीरी चमक गई थी। मीनू का कुछ पता नहीं था, हालाँकि उसकी तलाश में सीताराम पाठक ने अपने सारे घोड़े दौड़ा रखे थे। उन्होंने अखबारों में भी मीनू की गुमशुदगी की खबर मय फोटो के छपवाई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि उनके एक रिश्तेदार ने फैजाबाद से उन्हें खबर दी कि मीनू से मिलती-जुलती एक लड़की को उन्होंने यहाँ एक घर की छत पर देखा है। पाठकजी ने फौरन इसकी इत्तला पुलिस को दी। शुरू की कुछ टालमटोल और बाद में बड़े अफसरों के दबाव में आखिरकार पुलिस ने फैजाबाद के उस घर पर छापा मारा और मीनू को बरामद कर लिया।

इसी के बाद सीताराम पाठक ने वह प्रेस कांफ्रेंस करके मीनू का बयान दिलवाया जिसमें चेलाराम द्वारा उसके अपहरण और उस महान रामभक्त और हिंदू हृदय सम्राट नेताजी द्वारा उसके बलात्कार की बात कही गई थी।

मीनू के इस बयान के बाद राजनीतिक जमात में हलचल मच गई। विरोधी पार्टियाँ सक्रिय हुईं और नेताजी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। मुकदमा तो दर्ज हो गया लेकिन नेताजी ने यह कह कर मामले से पल्ला झाड़ लिया कि यह रामभक्तों को बदनाम करने की साजिश है और सीताराम पाठक विपक्षी पार्टी का एजेंट है। खैर... मुकदमा चलता रहा लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। मीनू का अब घर और गाँव में रहना और भी मुहाल हो गया था। आखिरकार सीताराम पाठक उसे अपने साथ सुल्तानपुर ले गए जहाँ छह महीने बाद उसने आत्महत्या कर ली और नाना के भूतों की मंडली में शामिल हो गई।

कहनेवाले तो यह भी कहते हैं कि सीताराम पाठक ने भी उसके साथ कम अत्याचार नहीं किए। सुल्तानपुर में वह एक तरह से सीताराम पाठक की मुफ्त की घरेलू नौकर और रखैल बन कर रही जिसके साथ रोज ही बलात्कार किया जाता था।

अब सच क्या है - यह तो भगवान ही जानता है।

इसके बाद की घटनाएँ कई वर्षों के दरमियान बड़ी तेजी से घटीं। मीनू कांड के कुछ ही महीनों बाद प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें चेलाराम को विधानसभा का टिकट मिल गया और वह 'रामभरोसे' विधायक भी चुन लिया गया। यही नहीं, जाने क्या गुंताड़ा बैठा कि वह तत्कालीन राज्य सरकार में मंत्री पद भी पा गया। वे परम रामभक्त और हिंदू हृदय सम्राट नेताजी जिन पर मीनू के अपहरण और बलात्कार का आरोप लगा था, को बाद में पार्टी की केंद्रीय कार्यकारिणी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया। यह अलग बात है कि बाद के दिनों में नेताजी और उनकी पार्टी राम का नाम ही भूल गई। राम के नाम में तो खैर चेलाराम की भी ज्यादा दिन तक समाई नहीं रही। शीघ्र ही प्रदेश की राजनीतिक स्थितियाँ बदलीं और चेलाराम ने तत्कालीन सत्ताधारी दलित-बहुजनवादी पार्टी का दामन थाम लिया जिसके टिकट पर आजकल वे दिल्ली में सांसद हैं।

इस बीच सीताराम पाठक भी ब्लॉक प्रमुख का चुनाव लड़े और जीते। आजकल वे उसी पार्टी की तरफ से विधानसभा में जाने की तैयारी में हैं जिसके नेता पर उन्होंने मीनू के अपहरण और बलात्कार का आरोप मढ़ा था।

हाँ, बीस साल हो गए लेकिन मीनू बलात्कार कांड का मुकदमा अब भी अदालतों में उलझा पड़ा है और उसका कोई नतीजा नहीं निकला। शायद कभी निकले भी नहीं।

बीस साल लंबा अरसा होता है। लगता है जैसे एक पूरा युग बीत गया। इस बीच पूरी एक पीढ़ी जवान हो गई। मामी बूढ़ी और लगभग अंधी हो गईं। सीताराम पाठक के बच्चे लखनऊ और दिल्ली में पढ़ने लगे। हाथ-हाथ में मोबाइल और घर-घर में कंप्यूटर और इंटरनेट आ गया। महानगरों में तो अब पड़ोसियों तक से बात फेसबुक और इंटरनेट के जरिए ही होती है। भोजन से ले कर सुलभ शौचालय तक की सारी सूचनाएँ अब हमारी मुट्ठी के मोबाइल में समा गई हैं।

लगता है कि नाना के भूतों ने भी गाँव-जवार के अपने डेरे छोड़ कर इंटरनेट को अपना आशियाना बना लिया है। इस बात का प्रमाण मुझे तब मिला जब भूत डाट कॉम की तरफ से हाल ही में मुझे एक ई-मेल मिला। जिसमें लिखा था कि आजादी के आंदोलन के समय 1946-47 के आसपास देश के पूर्वी हिस्से से कुछ भूत छोड़े गए थे जो अब पूरे देश में फैल गए हैं। उन्होंने ही इराक पर हमला करवाया, अफगानिस्तान को नेस्तनाबूत किया, पाकिस्तान और भारत को रेहन पर रख लिया है। हाँ, उन भूतों के कुछ नुमाइंदे आज भी संसद भवन के गलियारे में घूमते नजर आते हैं और गांधी प्रतिमा को नमस्कार करते हैं।


End Text   End Text    End Text