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कविता

उसकी लाल आँखें
फ़रीद ख़ाँ


1

उसकी आँखें लाल नहीं हैं।
न ही वह गुस्से में है।
उसके सामने जो जंगल जल गए, उसके बिंब अंकित हैं उनमें।

धनुष सी देह और तीर सी निगाह लिए जबकि वह चुपचाप खड़ा है। पर लोग नजर बचा के कनखी से ऐसे देख रहे हैं
मानो कुछ हुआ ही न हो।
हालाँकि ऐसी कोई खबर भी नहीं कि कुछ हुआ है।

अभी तो बस वह शहर में आया ही है,
और लोगों को हो रहा है किसी प्रलय का आभास।

इतनी सुरक्षा की भी क्या जरूरत थी,
वह तो पिंजड़े में है।
और कल से शुरू हो जाएगी उसकी नुमाइश।

2

वह अकेला ऐसा है,
जो बता सकता है क, ख, ग, घ के अलग अलग माने।
और उन्हें जोड़ कर बना सकता है शब्द। बता सकता है वाक्य विन्यास।

वह पहचान सकता है परिंदों को रंग और रूप से।
बोल सकता है उनकी बोली, समझता है उनकी वाणी।
उसके कंठ में अभी सूखा नहीं है कुएँ का पानी।

वह अकेला ऐसा है जो,
बता सकता है बच्चों को पेड़ों के नाम।

चिड़ियाघर में एक नए प्राणी के आगमन का, शहर में लगा है विज्ञापन।

 


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