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कविता

गंगा मस्जिद
फ़रीद ख़ाँ


(बाबरी मस्जिद ध्वंस की अठारहवीं बरसी पर)

यह बचपन की बात है, पटना की।
गंगा किनारे वाली 'गंगा मस्जिद' की मीनार पर,
खड़े होकर घंटों गंगा को देखा करता था।

गंगा छेड़ते हुए मस्जिद को लात मारती,
कहती, 'अबे मुसलमान, कभी मेरे पानी से नहा भी लिया कर'।
और कह कर बहुत तेज भागती दूसरी ओर हँसती हँसती। मस्जिद भी उसे दूसरी छोर तक रगेदती हँसती हँसती।
परिंदे खूब कलरव करते।

इस हड़बोम में मुअज्जिन की दोपहर की नींद टूटती,
और झट से मस्जिद किनारे आ लगती।
गंगा सट से बंगाल की ओर बढ़ जाती।
परिंदे मुअज्जिन पर मुँह दाब के हँसने लगते।

मीनार से बाल्टी लटका,
मुअज्जिन खींचता रस्सी से गंगा जल।
वुजू करता।
अजान देता।

लोग भी आते,
खींचते गंगा जल,
वुजू करते, नमाज पढ़ते,
और चले जाते।

आज अट्ठारह साल बाद,
मैं फिर खड़ा हूँ उसी मीनार पर।
गंगा सहला रही है मस्जिद को आहिस्ते आहिस्ते।
सरकार ने अब वुजू के लिए
साफ पानी की सप्लाई करवा दी है।
मुअज्जिन की दोपहर,
अब करवटों में गुजरती है।

गंगा चूम चूम कर भिगो रही है मस्जिद को,
मस्जिद मुँह मोड़े चुपचाप खड़ी है।
गंगा मुझे देखती है,
और मैं गंगा को। मस्जिद किसी और तरफ देख रही है।

 


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