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कविता

प्रिय
फ़रीद ख़ाँ


1

जैसे गर्म भाप छोड़ती है नदी,
रोज उसमें नहाने वालों के लिए
जैसे जाड़े की घूप
सेंकती है नन्हें पौधे को।
तुमने मुझे सेंका और पकाया है

मैंने पूरी दुनिया को भर लिया है आज अपने अंक में।

2

जब तुमने मुझे प्यार किया,
तो समझा कि दुनिया को प्यार की कितनी जरूरत है

हालाँकि दुनिया पहले भी चल रही थी,
पर अब धड़कती है वह मेरे भीतर

मैं अक्सर सपने में देखता हूँ खुद को भागता हुआ जंगल के बीच से
तुमने मुझे थाम लिया
जैसे धरती भरोसा है पेड़ों का,

जैसे पेड़ भरोसा हैं पशु-पक्षियों का,
अपने भरोसे में तुमने मुझे भर लिया
कि हम जरूर देखेंगे वह दिन
जब सृष्टि उतनी ही स्वाभाविक होगी
जैसी वह अपनी रचना के पहले दिन थी,
जब प्यार इतिहास नहीं बन जाएगा।

3

मैंने तुम्हारे खेत में जो धान रोपा था,
उसमें बाली आ गई है अब
वह धूप में सोने की तरह चमकती है,
और हवाओं की सरसर में वैसे ही झुकती है,
जैसे तुम झुक आती हो मुझ पर।

4

प्रिय, हर बार तुमसे एक होने के बाद
फिर से जन्म लेता हूँ कोमल कोंपल बन कर
हाँ, एक नई रचना ले रही है आकार
कहीं कोई अंकुर फूट रहा है।

5

अगर तुम नहीं होती
तो मैं ठीक ठीक तो नहीं कह सकता
कि मुश्किल और कितनी मुश्किल हो जाती
लेकिन तुमने मेरी मुश्किल आसान कर दी,
शायद यह न होता

कोहरे में जब हाथ को हाथ नहीं सूझता
तुम दिखती रही दीये की लौ की तरह,
और हटाती रही कोहरा
शायद यह भी न होता,
अगर तुम नहीं होती

तुमने आँखों को बीनाई बख्शी
चली आ रही समझ के परे,
समझने को दिखाया एक नया चाँद
तुम नहीं होती,
तो शायद रोशनी नहीं होती।

6

तुम ओस की बूँद की तरह मुझे ठंडक और नमी देती हो,
और मैं किसी पत्ते की तरह भीगा,
रोज सुबह उठता हूँ।

 


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