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संस्मरण

काशीनाथ सिंह : जान दी, दी हुर्इ उसी की थी
दिनेश कुशवाह


देखते-देखते काशीनाथ सिंह पचहत्तर पार गये। बिना किसी शोर-शराबे के। इस बीच उन्होंने बहुत कुछ अद्वितीय लिखा। 'काशी का अस्सी' और 'रेहन पर रग्घू' से लेकर 'महुवाचरित' तक। एक वाक्य में कहा जाए तो इन्हें सिर्फ काशीनाथ सिंह ही लिख सकते थे। पर मुझे आज बार-बार 'होल्कर हाउस में हजारी प्रसाद द्विवेदी' की याद आ रही है - ''कान आँखों से पूछते - तुमने तो देखा है उन्हें, बोलो न! कैसे हैं? हमने सुना तो है मगर देखा नहीं है। आँखें कानों से पूछतीं - मित्र, हमने देखा जरूर है रवीन्द्रपुरी की सड़क पर टहलते हुए, लेकिन सुना नहीं है, बताओ न! कैसा बोलते हैं?''

मैंने काशीनाथ सिंह को सन उन्नीस सौ अठहत्तर से सन उन्नीस सौ चौरानवे तक लगातार देखा है और सुना है। कुल सोलह वर्ष एक तरह से कहूँ तो बिला नागा। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन करते हुए, छात्र-कर्मचारी और अध्यापकों के आंदोलनों में भाग लेते हुए, अस्सी घाट पर रमते और चौराहे पर चाय पीते हुए, लंका पर पान खाते हुए और प्रेम करते हुए भी। अपने-बेगाने दोनों को। जिन दिनों मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का स्नातक हुआ वे अपने उपन्यास 'अपना मोर्चा' के 'ज्वान' लगते थे और थे भी। समाजवादी और साम्यवादी दोनों विचारधाराओं से जुड़े छात्रों और छात्र नेताओं के लाड़ले प्राध्यापक। जवान और जहीन, खूबसूरत और खैरख्वाह। दिल खोलकर छात्र-छात्राओं को लुटाने वाले। पिछले दशक से धूमिल, महेश्वर और कुमार संभव के चहेते काशीनाथ। तब काशी के बारे में इन आँखों और कानों ने बस देखा और सुना भर था। जहाँ तक उन्हें जानने का सवाल है, वे मेरी पहुँच से बहुत दूर थे। रीवा आने के बाद उनकी असीम कृपा और स्नेह पाकर भी, आज भी उनके संग-साथ की लालसा उसी प्रकार बनी हुर्इ है।

बी.ए. द्वितीय वर्ष में वे हमें प्रसाद जी का 'चन्द्रगुप्त' पढ़ाते थे -

प्रथम यौवन मदिरा से मत्त, प्रेम करने की थी परवाह,

और किसको देना है हृदय, चीन्हने की न तनिक थी चाह।

यहीं चाणक्य का एक अद्भुत आत्मालाप है -

''वह सामने कुसुमपुर है, जहाँ मेरे जीवन का प्रभात हुआ था। मेरे उस सरल हृदय में उत्कट इच्छा थी, कोर्इ भी सुन्दर मन मेरा साथी हो। प्रत्येक नवीन परिचय में उत्सुकता थी और उसके लिए मन में सर्वस्व लुटा देने की सन्नद्धता थी। परन्तु संसार - कठोर संसार ने सिखा दिया है कि परखना होगा। समझदारी आने पर यौवन चला जाता है- जब तक माला गूँथी जाती है तब तक फूल कुम्हला जाते हैं...।''

चन्द्रगुप्त नाटक के पद्यांशों और गद्यांशों को उस वर्ष जिस तरह काशीनाथ जी ने पढ़ाया था, वह अद्भुत था। स्वतंत्रता के बाद पहली बार जनता ने कांग्रेस की जड़ सत्ता को उखाड़ फेंका था। इंदिरा गांधी का भाल आपातकाल की कालिमा से भर गया था। जनता पार्टी के युवा तुर्कों का जमाना था। ऐसे में कला संकाय में एक रचनाकार को अध्यापक रूप में बहते देखना बहुत सुखद अनुभव था। यही वे दिन थे जब मैंने मन ही मन उन्हें गुरु मान लिया था।

''समझदारी आने पर यौवन चला जाता है - जब तक माला गूँथी जाती है फूल कुम्हला जाते हैं'' की व्याख्या में उस दिन पूरा घंटा समाप्त हो गया था। कक्षा से निकलते समय गुरु की आँखें न थीं। उस दिन उन्होंने हाजि़री भी नहीं ली। मेरे किशोर मन में एक भाव फूटा - काशीनाथ जी भी दिल रखते हैं। तब मैं नहीं जानता था कि गुरु के अनमोल बोलों में एक बोल 'दिल रखना' भी है। जिसके लिए उन्होंने 'लाखों के बोल' सहे हैं। न गुरु जानते थे कि चेला इस कच्ची उमर में ही 'दीक्षित' हो गया है। यानी कि किशोर साँड़ को कहीं दाग दिया गया है और यह ऐसा दाग है जो उम्र के साथ निरन्तर बढ़ता और स्थायी होता जाएगा। लब्बोलुवाब ये कि ''निग़ाहे-कैस बचपन से ही यारो आशिक़ाना थी।''

महाभारत के आदिपर्व में संसर्ग विधा का उल्लेख है। और तुलसीदास ने तो मानस में सत्संग की महिमा को उच्चतम दर्जा दिया है। कितनी बार मैंने महसूस किया है कि गुरुदेव के साथ रहने पर हृदय के विमल विलोचन खुल जाते हैं। लगभग दस वर्षों तक मैं काशीनाथ जी के साथ विश्वविद्यालय से अस्सी, पैदल आता-जाता रहा हूँ। उन्होंने मुझे कक्षा में भले पढ़ाया हो पर स्नातक मैं उनकी सत्संग विधा का ही हूँ। गुरु घर से निकलकर लंका पर दो भुट्टे, सौ-दो सौ ग्राम मूँगफली या लार्इ-चना लेते। ठोंगा मेरे हाथ में पकड़ा देते। और 'चर्वण' करते-कराते-बतियाते-गपियाते अस्सी। पूर्णाहुति अस्सी पर चाय और पान से होती। एक बार मैंने कहा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य एवं अध्यक्ष का यह 'चर्वण' कुछ सज्जनों को दुराचरण लग सकता है। गुरु हँसते हुए बोले, ''दिनेश जी! मैं अध्यक्षी का चोला छोड़ सकता हूँ पर अस्सी और यह झोला नहीं।'' सज्जनो! अस्सी चौराहे-मुहल्ले में गुरु के प्राण बसते हैं। उन्हीं के शब्दों में, ''जब भी याद करता हूँ इस नगर को, यह 'मुगले आज़म' फिल्म के अकबर की तरह मेरी आँखों के आगे खड़ा, तमतमाया हुआ, हाँफता-हूँफता नज़र आता है। वही गुस्से में आग उगलती आँखें, थरथराता बदन, घनघनाती आवाज सुनार्इ पड़ती है - 'अनारकली, सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे।'

यह अकबर और कोर्इ नहीं हिन्दी विभाग था और सलीम मेरा अस्सी, अस्सी मुहल्ले के लोग, वहाँ के मेरे पढ़-अपढ़ यार-दोस्त और वे लड़के जिनके साथ मैं पढ़ता-पढ़ाता था।

यह अनायास नहीं था कि जब डाक्टर साहब ने अपनी लेखनी कहानियों से संस्मरणों की तरफ मोड़ी तो 'देख तमाशा लकड़ी का', 'नागानंद चरितम वल्द अस्सी चौराहा', 'संतो घर में झगरा भारी' आदि संस्मरण रिपोर्ताज 'अस्सी' पर केंद्रित थे। उनका 'आत्मतर्पण' 'रहना नहिं देस विराना है' भी अस्सी को नहीं भूलता। मित्रो! ये सारे शीर्षक यों ही नहीं आए। काशीनाथ जी के भीतर कबीर बहुत गहरे तक बैठे हैं और ग़ालिब भी।

ग़ालिब की गजल 'कोर्इ दिन ग़र ज़िन्दगानी और है।' उन्हें बहुत प्रिय है। गुमसुम रहने की स्थति में इसका एक शेर मैंने कर्इ बार उन्हें बुदबुदाते हुए सुना है -

हों गर्इं ग़ालिब बलाएं सब तमाम,

एक मर्गे-ए-नागहानी और है।

'निर्वेद' काशीनाथ जी का स्थायी भाव नहीं तो संचारी भाव अवश्य है। कर्इ बार उन्हें देखकर मुझे लगा है कि वे किसी अघटित से जूझने की तैयारी कर रहे हैं। उनका आत्मतर्पण ऐसी जीवन स्थितियों से भरा पड़ा है। अपनी मृत्यु को भी वे इसी तरह लेते हैं। काशीनाथ सिंह में कहीं न कहीं 'उसने कहा था' का लहना सिंह और 'तीसरी कसम' का हीरामन भी हैं पर वे उन्हें किसी से परिचित नहीं कराना चाहते।

मैंने काशीनाथ जी को अरसे तक पढ़ा है। बार-बार समझने की कोशिश की है। उनकी रचनाओं को पढ़ा है और उनके साथ छककर जीने की कोशिश की है, पर आज भी आपसे यही कहूँगा कि उन्हें जानना आसान नहीं है। ये जानना भी अजीब क्रिया है। सुना है, कर्इ बार किसी एक को जानने के लिए कर्इ जनम लेने पड़ते हैं। और मेरे गुरु काशीनाथ! कहते हैं, सरल पहेलियाँ बड़ी कठिन होती हैं। वे गंगा किनारे के 'छोरा' भी हैं और 'बमभोले' भी। पीपल की तरह डोलते हैं, पर मैं उन्हें बूझ नहीं सकता। जैसे उनका नाम। यह काशीनाथ भी भला लेखकों जैसा नाम है। पर उसे उन्होंने सच्चिदानन्द से अज्ञेय, सुदामा से धूमिल, गुसार्इं दत्त से सुमित्रानंदन या कैलाश से कमलेश्वर करने की नहीं सोची। शायद इसलिए भी कि उन्होंने डॉ. नामवर सिंह को 'पुनीत' और डॉ. बच्चन सिंह को 'रसिकेश' से तौबा करते देखा था।

इस गँवर्इ नाम 'काशीनाथ' का साथ अगर इसी दिलेरी से किसी ने दिया तो 'दूधनाथ' ने। और है कोर्इ दूसरा? अगर हो भी तो मैं नहीं जानता। 'काशीनाथ' इस नाम को यार के रेशमी रूमाल की तरह गले में लपेटे देखा है ज्ञानरंजन और रवीन्द्र कालिया को, इस नाम को मान से मर्यादित करते देखा है मनोहरश्याम जोशी को, इस नाम से लाड़पूर्वक लिपटते देखा है डॉ. कमला प्रसाद को। इस नाम पर 'काशी सम कौन कुटिल खलकामी' कहकर दाद देते हुए देखा है राजेन्द्र यादव को जो बड़े भार्इ का मित्र होते हुए भी काशी को छोटा भार्इ नहीं, दोस्त मानते हैं। इस नाम का सबसे अधिक प्रेमिल उच्चारण करते देखा है अरुण कमल को और कुलगीत की तरह गाते देखा है कथाकार त्रय शंकर-अभय-नर्मदेश्वर को। इस नाम को सबसे अधिक अधिकारपूर्वक पुकारते देखा है आलोचक प्रवर नामवर सिंह को। और देखा है इस नाम पर सबसे अधिक कसैलेपन से काँखते हुए हिन्दी विभाग, हिन्दू विश्वविद्यालय के कुछ अध्यापकों को। इस नाम से इश्क करते हुए देखा है कथाकार रमाकांत श्रीवास्तव को और काशी के तन्नी गुरु से लेकर संजय राय तक उन बनारसी लोगों को जो किसी की भी धोती खोल सकते हैं अगर वह उनके सामने बनने की कोशिश करे। चाहे वह वीरेन्द्र श्रीवास्तव हों या झुन्ना गुरु, हरिद्वार पाण्डेय हों या रामजी राय। बर्फी वाले सरदार हों या चाय वाले पप्पू। अगर इस नाम-महिमा पर झल्लाकर आप कहें कि काशी ने किया ही क्या है? तो मैं कहूँगा कि काशी ने बनारस को सार्थक करने की कोशिश की है। सूचना के लिए निवेदन है कि अगर कोर्इ बनारसी इतना कर दे तो वह मोक्ष को ठेंगे पर रखता है। बनारस में ऐसे नीलकण्ठों को विषपान में भी आनन्द आता है।

सियारामशरण गुप्त और मुक्तिबोध जैसे अनेक उदाहरणों के बीच काशीनाथ सिंह ही साहित्य में ऐसे छोटे भार्इ हैं जिन्होंने अपनी रचनात्मकता हर तरह से सिद्ध कर दिखार्इ है। वरना रचना की दुनिया के कुचक्रियों ने बड़े भार्इ का नाम लेकर उन्हें व्यकितत्व और कृतित्व दोनों स्तरों पर कुतर देना चाहा। पर गुरु के ही अनमोल बोलों में से एक बोल दुहराऊँ तो, 'चाहने से होता क्या है?'

उनके अनमोल बोलों में 'फिर भी' और 'खैर' भी हैं। मुझे पक्का यकीन है कि इनका संबंध फिराक़ की दो गजलों से है।

पहली :

किसी का कौन हुआ, यूँ तो उम्र भर, फिर भी,

ये हुस्नो इश्क़ तो धोक़ा है सब, मगर, फिर भी।

दूसरी :

मैं मुद्दतों जिया हूँ, किसी दोस्त के बग़ैर,

अब तुम भी मुझे छोड़ने को कह रहे हो, खैर।

अपनी जीवन स्थितियों में बहुत बार धोखा खाये जीव हैं काशीनाथ जी। 'इंक्वायरी कमेटियों' से प्रताड़ित करवाये गये प्राणी हैं। किस पर विश्वास करें? और किसी पर विश्वास क्यों न करें? ये दोनों प्रश्न उन्हें घेरे रहते हैं। 'लोग बड़े चालाक हैं, भर्इ।' रह-रहकर उनकी समझ में आता है। फिर भूल जाते हैं। शायद यही कारण है कि वे किसी से खुलकर मिलने में हिचकते हैं। पहली बार अगर कोर्इ उनसे तत्काल निकटता चाहे तो यह संभव नहीं है। एक ही बार में आकण्ठ मुलाकात से वे बहुत बचते हैं। जीयनपुर से जो भोलापन लेकर वे बनारस आये थे उसे क्रूर छलों ने बार-बार आहत किया। काशीनाथ जी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कृष्ण की तरह अपने अगल-बगल राजाओं-महाराजाओं, स्त्री-पुरुषों से घिरे रहने के बावजूद नितान्त अकेला महसूस करते रहे हैं। कर्इ बार मैंने महसूस किया है कि डॉ. चौथीराम यादव ही उनके सुदामा, उद्धव और पार्थ तीनों हैं। कृष्ण की तरह जीवन के अंतिम दिनों में भी 'अकेलापन' काशीनाथ जी की नियति है।

इसका यह मतलब नहीं कि काशीनाथ जी अपनी हँसी भूल गए। चुपचाप रहना उनकी आदत है पर मौका मिलते ही न वे अपनी हँसी रोक पाते हैं न हँसी-ठट्ठा से बाज आते हैं। इसके लिए दो उदाहरण काफी होंगे।

अमरकंटक में आयोजित कहानी शिविर में हरिशंकर परसार्इ की कहानी 'भोलाराम का जीव' का पाठ चल रहा था। नारद जी ने स्वर्गीय भोलाराम जी की पत्नी से पूछा - 'तुम्हारे पति का पड़ोस मुहल्ले की किसी स्त्री से गलत संबंध तो नहीं था?' कि काशीनाथ जी को हँसी आ गयी। डॉ. धनंजय वर्मा को लगा कि काशी ने कहानी की गंभीरता नष्ट कर दी। उनकी नाराजगी देखने लायक थी।

काशीनाथ जी के पिता बी.एच.यू. मेडिकल कालेज में भर्ती थे। उनका पेशाब रुक गया था। काशीनाथ जी के साथ मैं, डॉ. चौथीराम यादव, देवेन्द्र, सियाराम जी, कामेश्वर सिंह, शैलेन्द्र आदि परेशान-हाल लगे हुए थे। नर्स ने एक 'कण्डोम' लाने के लिए कहा जिसे उन्हें पहनाकर नली लगानी थी। रविवार का दिन था और लंका पर आसपास की दुकानें बंद थीं। काशीनाथ जी ने हम सबकी ओर देखा। मेरे मित्र कहानीकार देवेन्द्र बोल पड़े, ''दिनेश जी के अतिरिक्त हास्टल में इसकी संभावना अन्यत्र नहीं है।'' लोग हँस पड़े। लेकिन काशीनाथ जी कहाँ कम हैं? बोलते भए, ''पिता जी ने तीन प्रतिभाशाली पुत्रों को पैदा किया। जाते-जवाते यह भी बदा था।'' इति श्री गुरुवे नम:।

काशीनाथ जी बहुत मोहक ढंग से मुस्कराते हैं। इसमें उनकी आँखें बराबर की शरीक होती हैं। 'राम की शक्तिपूजा' के राम की तरह पता नहीं कभी उन्हें यह भान हुआ या नहीं कि 'कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।' पर वे नेत्र क्या हैं! एक दूधिया तालाब में उगे हैं दो श्वेत कमल। जरूर किसी ने कभी कस कर याद दिला दिया होगा। क्योंकि वे आँखों पर बहुत जोर देते हैं। रचना की आँख पर। रचना में अगर सब कुछ है और आँखें नहीं हैं तो वह काशी के लिए निहायत फीकी है। दूसरा ध्यान उनका मुँह पर जाता है, रचना के मुँह पर। ''आपने कहानी में पूरा जहरबाद दिखा दिया है देवेन्द्र जी! बलबला रहा है फोड़ा। चारों तरफ से टीस रहा है। पर आपने उसका मुँह नहीं दिखाया। आखि़ार कहीं तो होगा वह! कहाँ से फूटेगा, भला।''

काशीनाथ जी जैसी स्वच्छ-पानीदार और भली आँखें विरलों को मिलती हैं। उनकी रंगत पूरी तरह तब खिलती है जब वे अपने अन्तरंग मित्र ज्ञानरंजन द्वारा सुनाया एक गीत किसी साहित्यिक यात्रा में सुनाते हैं -

रेगें रे सखी! मोरी अंग-अंग पानी

जोबना के भार भइली कमर कमानी

रेगें रे सखी...

या बचपन में अपने गाँव जीयनपुर में सीखे कहरवा का एक टुकड़ा सुनाते हैं -

नून देबो मँगनी हो तेल देबो मँगनी

मँगनी बलमुआ न देब।

हमरो बलमुआ ह फूल के जोखलका

कम होर्इ केकरा से लेब।

यहाँ भाष्य करने की जरूरत है कि नायिका कहती है - मैं उधार में नमक तो दे सकती हूँ, यहाँ तक कि तेल भी, पर किसी भी हाल में प्राण प्यारे को उधार नहीं दूंगी। हे सखी! अब तुम खुश रहो या नाराज। मेरे वो तो फूल के भार के बराबर हैं, अगर मैंने तुम्हें दिया और वे कम हो गये तो मैं किससे लेने जाऊँगी?

एक मिनट के लिए मेरे मन में कुसुम भाभी का चित्र उभरता है और मैं उनके बलमुआ और अपने गुरु पर न्यौछावर हो जाता हूँ।

हाँ, तो मैं कह रहा था कि काशीनाथ जी बहुत जालिम ढंग से मुस्कराते हैं। कभी-कभी यह अंदाज कातिलाना हो जाता है। इस क्रिया में वे अपने होंठों के साथ अपनी आँखों को भी समिमलित कर लेते हैं। पर इसका मतलब यह कतर्इ नहीं कि आप उन पर न्यौछावर हो जाइए। दरअसल, ऐसा वे तब करते हैं जब वे आप पर न्यौछावर हो रहे होते हैं। बहुधा किसी सीधे-सादे लेखक या अपने प्रशंसक को पाकर वे इस अंदाज में होते हैं। विश्वास न हो तो कभी उन्हें भार्इ देवीशरण ग्रामीण से मिलते हुए देखिए।

भगवान सिंह के उपन्यास 'अपने-अपने राम' में राजाराम तापस बालक लव और कुश से पूछते हैं - ''यह कविता जिसे तुम गाते हो किसने रची?'' ''गुरुदेव ने! वही तो अकेले कवि हैं इस संसार में। वह रचते नहीं, गाते हैं। बस गाते चले जाते हैं और गाते हुए रोने लगते हैं। हमने पूछा, आप रोते क्यों रहते हैं गुरुदेव! तो बोले, दोनों एक ही सत्य के रूप हैं। दोनों ही नहीं तीनों। जब वह कण्ठ से फूटता है तो लोग उसे कविता कहते हैं, आँखों से झरता है तो आँसू और जब एकतारे के तारों से फूटता है तो संगीत।''

काशीनाथ जी की आँखों को कितनी बार छलछलाते हुए देखा है मैंने।

गुरुदेव की बड़ी बेटी रचना ठाकुर की शादी दूधनाथ जी के बड़े बेटे अनिमेष से हो रही थी। डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र के साथ नीलकांत जी को सकुशल रेलवे स्टेशन छोड़कर जब लौटा तो रात के दो बज रहे थे। घराती और बराती दोनों सो गये थे। दूधनाथ सिंह और चौथीराम जी के साथ काशीनाथ जी जगे थे। कमर सीधी करने के लिए हम चारों ने एक दरी आँगन में बिछार्इ और रसोर्इघर से निकली पक्की नाली को तकिया बना लिया।

'क्यों दूधनाथ, कुछ लोगे?' काशीनाथ जी बोले।

'सरऊ, अब धियान आया है।'

'नाराज हो रहे हो?'

'नहीं रे। जी मगन है। आज कुछ नहीं।'

'वाह! क्या खूब निभाया तुमने दूधनाथ।'

फिर दोनों एक-दूसरे को गले लगाकर फफक पड़े।

भोपाल से उड़ी खबर पूरे देश में झंझावात की तरह फैल गई कि भारत भवन में रंगमण्डल के निर्देशक और प्रख्यात रंगकर्मी ब.व. कारंत ने अपने ग्रुप की अभिनेत्री विभा मिश्र को प्रणय कलह में जलाकर मारने की कोशिश की है, तो हम दोनों अस्सी पर दीक्षित जी (पत्रिकाओं की दुकान) के यहाँ बैठे थे। गुरु के हाथ में वाराणसी का सांध्य दैनिक 'गांडीव' था और उसमें खबर थी कि कारंत को इस अपराध में जेल भेज दिया गया है। विभा अस्पताल में हैं। मैं आश्चर्यजड़ था। कुछ माह पूर्व ही बनारस में 'स्कंदगुप्त' का मंचन हुआ था और काशीनाथ जी के सौजन्य से विभा और कारंत जी से मेरी मुलाकात हो चुकी थी।

एकाएक गुरु ने मेरा हाथ पकड़ लिया। आँखों में आँसू भर आये थे। स्वरभंग की दशा में काशीनाथ जी ने कहा, ''नहीं दिनेश जी! नहीं!! यह बात सच नहीं लगती। मैं कारंत को जानता हूँ। वे ऐसा नहीं कर सकते।''

कुमारसंभव की पत्नी और दोनों बच्चे रामपुर में रहते थे। अभी हाल-फिलहाल उन्होंने बरेली में एक फ्लैट खरीदा था और स्थानान्तरित होकर वहीं चले गये थे। उसी फ्लैट में रमेशचन्द्र पाण्डेय 'कुमार संभव' ने अपने को जलाकर मार डाला। भयावह आत्महत्या।

क्या मासूम आदमी थे कुमार संभव? उनके मरने से कुछ दिनों पहले हम तीनों रामपुर रेलवे स्टेशन की पथरीली बेंच पर बैठे हुए थे। कुमार संभव से यह हमारी आखिरी मुलाकात थी। दो दिन से वे लगातार चहक रहे थे पर इस विदा-वेला में कुछ उद्विग्न थे। पास ही मूलचंद गौतम और महेश राही खड़े थे। कुमार ने मुझे उठाकर उन दोनों को गुरु के पास बिठाया और एक तरफ ले जाकर बोले -

'तुमने यश चोपड़ा की फिल्म 'लम्हे' देखी है।'

'हाँ।'

'अगर ऐसा ही किसी के जीवन में हो जाये तो?'

'तो कहानी लिखे।' मैंने परिहास किया।

'ठीक है, काशी गुरु से मत बताना। नही तो कहेंगे - 'जिन्दगी में कभी सीरियस नहीं होंगे कुमार संभव।' फिर एक जोरदार ठहाका।

वह दारुण खबर पहले मुझे मिली। बिड़ला हास्टल से भागता मैं गुरुदेव के घर पहुँचा। मेरी हालत देखकर वे अचकचा गए। किंचित घबराहट में उन्होंने पूछा - 'क्या हुआ दिनेश जी।' मैंने सुबकते हुए कहा, 'कुमार संभव ने आत्महत्या कर ली।' गुरु की आँखें भरभरा आर्इं। उन्होंने दीवार की तरफ मुँह कर लिया। अब उनकी हिलती हुर्इ पीठ भर दिखार्इ दे रही थी। अचानक वे पलटे और 'हाय रमेश।' कहकर फूट पड़े। थोड़ी देर बाद आँखें पोंछते हुए बोले, 'मुझे देवेन्द्र की भी बहुत चिन्ता रहती है दिनेश जी।'

आज याद करता हूँ तो लगता है उन सोलह सालों में मेरे गुरु ने सोलह बार भी 'तुम' या 'दिनेश' नहीं कहा होगा। 'दिनेश जी' सुनते सुनते जब मन ऊब जाता कि अचानक किसी दिन अभागे कानों को पीछे से सुनाई पड़ता - 'दिनेश है क्या?' या ''सुनो दिनेश! 'भारती' में एक फिल्म लगी है। लगन हो तो चलो, चलें।''

काशीनाथ जी का वश चलता तो जिस तरह बनारस में गंगा बहती है उसी तरह अपने दिल में एक गंगा बहाते रहते। और बार-बार आवाज देते कि, 'हे कमला प्रसाद! हे महेश कटारे! हे रमाकांत! हे नरेन! हे मेरे जि़गर के टुकड़ों रामदेव सिंह, देवेन्द्र और दिनेश! तुम लोग क्यों हो भोपाल, ग्वालियर, खैरागढ़, पटना, मुगलसराय, लखीमपुर और रीवा? इस तीनों लोकों से न्यारी काशी में रोज ही मेरे मन की गंगा में डुबकी लगाओ। मेरे दिल के घाटों पर हर शाम बैठो।'

और ''ऐ देवेन्द्र जी! और हाँ, सुनिए दिनेश जी! जब तक यह बूढ़ा जिन्दा है तुम दोनों के सारे पाप मेरे हवाले। मेरे सारे पुण्य ले लो। तुम्हारे सारे पाप लेकर, इस काशी में मैं किसी ब्रह्मा -विष्णु-महेश से निपट लूँगा। और बाबू आर.डी. सिंह (मुगलसराय में, उत्तर भारत के लेखकों के विश्राम गृह, कथाकार रामदेव सिंह) के लिए क्या कहूँ? वे तो कभी कोर्इ पाप नहीं करते। उनसे पुण्य की चवन्नी मात्र लेकर दिनेश जी मजे करते रहते हैं।''

मित्रो! हो सकता है इसमें आपको कुछ अत्युक्ति लगे क्योंकि काशीनाथ जी 'फाल्गुनी' नदी की तरह अंत:सलिला हैं। नारिकेल व्यकितत्व है उनका। बाहर से कठोर और अंदर से मुलायम। इसी गुण के कारण संस्कृत के कुछ अनमोल ग्रंथों को 'नारिकेल काव्य' कहते हैं। श्री हर्ष का 'नैषध चरित' ऐसा ही ग्रंथ है। उसमें वे लिखते हैं -

वाग्जन्मं वैफल्यं सह्यशल्यम

गुणादभुते वस्तुनिमौनिता चेत।।

खलत्वमल्पीयसि जलिपतेतु

तदस्तुवंदि भ्रमभूमितैव।।

अर्थात अद्भुत वस्तु के वर्णन में अगर मनुष्य मौन साध लेता है तो उसकी वाग्शक्ति का होना ही व्यर्थ है। जो प्रतीत होता है उसका यदि थोड़ा वर्णन करता है तो उस पर खलत्व का दोष आता है। इसलिए किसी महापुरुष के वर्णन में वंदी यानी स्तुतिकर्ता पद की स्वीकृति कर लेना ही अच्छा है। ऐसा इसलिए कि जिस कथा को मैं कह रहा हूँ वह ज्ञान (प्रख्यात कथाकार ज्ञानरंजन) के 'कसिया' या कमला के 'काशी' की कथा नहीं है। यह मेरे गुरु की कथा है। तुलसीदास ने 'सूकरखेत' में अपने गुरु से जो कथा सुनी थी, उसे 'तब अति रहेऊँ अचेत' के कारण ठीक से समझा नहीं था। प्रौढ़ावस्था में पूरी तैयारी, स्मृति एवं प्रतिभा के बल पर 'रामचरित' संभव हुआ। मैंने अपने गुरु की जो कथा पढ़ी या सुनी है उसका अधिकांश हिस्सा मेरे बालपन से जुड़ा है। विडम्बना देखिए कि आज जब मुझे उस कथा को कहना पड़ रहा है तब भी मैं 'अचेत' ही हूँ।

आपसे बाल वचन मन लगाकर सुनने का आग्रह क्या करूँ? पर एक विनती जरूर कर रहा हूँ। मेरी प्रौढ़ावस्था में एक बार मेरे गुरु के बारे में जरूर पूछिएगा। तब मैं बताऊँगा कि तुलसी 'गिरा अनयन नयन बिनु बानी' लिखकर क्या कहना चाहते थे!

काशीनाथ जी गाँव के किसान की तरह कुछ भोली चतुराइयाँ करते हैं। उनकी कुछ कमजोरियाँ हैं - जैसे नीम का दातून, चने का सत्तू, अंकुरित चना या मूँग या बहुत हुआ तो अमरूद, जामुन या भुट्टा।

किसी का अच्छा कुर्ता, अच्छा झोला या अच्छी शाल उन्हें ललचाते हैं। जरा ये पत्र पढ़िए जो गुरुदेव ने मुझे नौ जनवरी सन उन्नीस सौ पंचानवे को लिखा है -

प्रिय दिनेश,

आज ही नए वर्ष का ग्रीटिंग कार्ड मिला। उसमें तुलसीदास! क्या कहने? कवियों में कम रह गए हैं जिन्होंने तुलसी को इस तरह पढ़ा हो। तुम्हारी तुलसी से यह आत्मीयता मुझे बहुत भाती है।

तुलसी से कवियों के लिए ही नहीं, कथाकारों के लिए सीखना अभी बहुत बाकी है।

मैं र्इयर्स ईव (31 दिसम्बर की शाम 8 बजे) बिलासपुर प्लेटफार्म पर नहीं, यार्ड में खड़ी एक अँधेरी बोगी में था और दुर्ग से आने वाली सारनाथ एक्सप्रेस का इंतजार कर रहा था। उसे आने में ढार्इ घंटे बाकी थे।

मेरे 'ब्रीफकेस' में रायल चैलेंज ह्विस्की का एक पौवा पड़ा था और बोगी के हुक में झूलता पानी का फ्लास्क।... इसके पहले वर्षान्त कभी भी ऐसा नहीं गुजरा था। बेहद अकेला और उदास। ठंड भी थी। संबलपुर से दोपहर बाद चला था। मैं दोनों सामान लेकर लाइनों के पार एक ढूह पर बैठ गया।... और आसमान में चाँद था, आते-जाते इंजनों की छुक-छुक थी और हाथ में भरा हुआ फ्लास्क था।

नया साल शुरू हुआ तीन दिन बाद जब बच्चन जी के यहाँ कवि केदारनाथ सिंह आए। गो मैं उनके लिए आधी बोतल एक अच्छी विहस्की लेकर गया था जिसे बड़े उछाह से उन्होंने लिया और अदृश्य कर दिया। उसके बाद फुटपाथ पर दवा बेचने वाले की तरह एक-एक करके जाने कहाँ से आधा दर्जन शीशियाँ निकालीं। किसी शीशी में एक चम्मच, किसी में चार चम्मच। ... बहरहाल सभी शीशियों के प्रताप से बच्चन जी एक ओर लुढ़के, केदार जी दूसरी ओर। मैं 'सहस्सों पराजितो विय' रथयात्रा से अपने घर आया।

जले पर नमक यह कि दूसरी सुबह केदार जी ने फोन करके कहा कि शाम यादगार रही।

मैंने नहीं पूछा कि किसके लिए?

हाँ, केदार जी भोपाल से सप्तक-संगोष्ठी से लौटे थे और उनके कंधे पर नीले या आसमानी रंग की शाल थी जिसे देखकर मैं ललच गया। बताया कि यह शाल प्रत्येक भागीदार को कमला ने वहाँ भेंट की। सम्मेलन की ओर से। मन हुआ कि कमला को लिखूँ कि सम्मेलन में शिविरों की मेरी लंबी सेवाओं को देखते हुए एक शाल मुझे भी भेंट करो नहीं तो मैं जब कभी गर्मी में भी रीवा आऊँगा तो बक्से से निकलवाकर तुम्हारे हिस्से की शाल मार लूँगा जबरन।

लेकिन मायाराम जी के हादसे ने रोक दिया।

हालाँकि मेरी धौंस आज भी जहाँ की तहाँ है।

अब मैं खाली हूँ - अध्यक्षता की झंझटों से। लिखना चाहता हूँ। लेकिन लौटने में वक्त लगेगा। आदत ही छूट गर्इ है। सारा कुछ जैसे भूल गया हूँ। इतना याद है कि कभी लेखक था। जिस कलम और हाथ से लिख रहा हूँ, उससे तीन साल नोटिसें और आदेश लिखता रहा हूँ।

सारा कुछ नए सिरे से शुरू करना होगा - ऐसा लगता है।

तो मेरी ओर से भी नए साल की मंगल कामनाएँ। कमला को और भी ज्यादा अगर वे तुम्हारे हाथों इस ठंड में शाल भिजवा दें। जहाँ-जहाँ जाऊँगा, उनकी उदारता, सदाशयता आदि-आदि गुणों के बखान ही करूँगा।

तुम्हारा

काशीनाथ

मेरे गुरु की स्मृति का कोर्इ जवाब नहीं। आज भी उन्हें घटनाएँ, कथाएँ, कविताएँ, शेर यहाँ तक कि फिल्मी गाने और कौवालियाँ तक इस तरह याद हैं जैसे किसी युवतर मेधावी को याद रहती हैं। प्रसंग उनके छोटे बेटे मण्टू के विवाह का है। मेरे आत्मीय मित्र नारायण सिंह की बेटी वंदना का विवाह जब सिद्धार्थ से तय हुआ तो मैं रीवा विश्वविद्यालय में आ चुका था। मैं इतना प्रफुल्ल था कि तीन दिन पहले ही आकर गुरु के यहाँ डेरा डाल लिया। शादी में कथाकार संजीव भी घरातियों के साथ आने वाले थे। मेरी प्रसन्नता का कारण यह था। घर के पास ही एक किलोमीटर की दूरी पर जनवासा के लिए विवाह घर लिया गया था। काशीनाथ जी के आवास से जब बरात चली तो अधिकांश लोग पैदल ही दूल्हे की सवारी के पीछे चल पड़े। सबसे पीछे जो टोली थी उसमें नामवर सिंह, डॉ. बच्चन सिंह, काशीनाथ जी तथा चौथीराम जी के साथ मैं भी था। समानान्तर में डॉ. बलराज पाण्डेय, अवधेश प्रधान और देवेन्द्र आदि चल रहे थे। जाड़े के दिन थे। लगभग सबके सिर पर टोपी थी। नामवर जी ने सबको सुनाते हुए कहा, ''चौथीराम जी! टोपी बहुत फब रही है।'' अपने चिरपरिचित विनय और शील के साथ चौथीराम जी ने कहा, ''भैया, ये टोपी तो पहले भी लगाता था।'' बच्चन जी बोले -

'इसमें नई बात क्या है?'

'बच्चन जी! यह बाँकपन अध्यक्ष होने पर आता है।' नामवर सिंह ने किंचित मुस्कुराते हुए कहा।

काशीनाथ जी के बाद गुरुवर चौथीराम यादव काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग के अध्यक्ष बने थे। जब काशीनाथ जी ने आचार्य नामवर सिंह की तरफ देखा तो वे उसी बानगी, बराती रंग और अपनी यदा-कदा चौंकाने वाली विनोद शैली में बोले - काशीनाथ जी, आप नहीं समझेंगे- 'ख़ुदा जब हुस्न देता है नज़ाकत आ ही जाती है।' सभी लोग हँसने लगे - यह मुहावरा बनी पंक्ति मैं कितनी बार सुन चुका था। मैंने एक साल तक इस चित्त पर चढ़ी पंक्ति के आगे-पीछे क्या है लोगों से पूछता रहा। सबने कहा यह तो बहुत मशहूर है, पर और कैसे है नहीं जानता। आखिर एक दिन वर्षों बाद जब 'अध्यक्षी' और तमाम विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागाध्यक्षों की चर्चा चल रही थी तो मैंने अपने गुरु से पूछ ही लिया - 'क्या है आगे?' गुरुदेव विश्वमोहिनी मुस्कान के साथ उसी पुराने अंदाज में उच्चरित हुए -

क़दम गिन-गिन के रखती हो, कमर बल खा ही जाती है

ख़ुदा जब हुस्न देता है, नज़ाकत आ ही जाती है।

जय हो गुरुदेव! मुझे कबीर के सदगुरु याद आए -

राम नाम को पट तरे, देबे को कछु नाहिं

क्या दे गुरु संतोषिये, हौंस रही मन माहिं।

कुछ लोग कहते हैं - काशीनाथ सिंह 'लेऊसिंह' हैं 'देऊसिंह' नहीं हैं। यानी कि मेरे यहाँ आएँगे तो क्या-क्या ले आएँगे! और आपके यहाँ आऊँगा तो क्या-क्या खिलाएँगे? पर मैं क्या कहूँ! मेरे साथ तो गंगा उल्टी बहती रही है। बल्कि उनकी कृपाएँ याद कर एक बाँग्ला कवि की पंकितयाँ याद आती हैं जिनका भाव यह है कि, ''यह अपार समुद्र जिसकी कृपा का बिन्दु मात्र है उसे मैं कृपा सिन्धु कैसे कहूँ?'' मित्रो! इसके लिए एक क्षेपक -

कमला प्रसाद जी के छोटे बेटे परितोष की शादी थी। डॉ. सत्यप्रकाश मिश्र ने बरातियों के लिए अति उत्तम इंतजाम किया था। ज्यादातर बराती दोनों पक्षों से जुड़े थे। बरात में काशीनाथ जी भी आये थे। बरात लगने के समय उन्हें लेने के लिए दूधनाथ जी होटल पहुँचे। पूरी तरह सजे-धजे। काशीनाथ जी निकले तो उनके हाथ में एक थैला था। दूधनाथ सिंह ने पूछा,

'यह क्या है, काशी?'

'कपड़े हैं।'

'क्या मण्डप में चलकर पहनोगे?'

'नहीं जी, दिनेश का कुर्ता-पायजामा है। बनारस से लाया हूँ।'

'साले! शरम नहीं आती। स्टुडेंट का कुर्ता-पायजामा ढोते हो।'

काशीनाथ जी मुस्करा कर रह गये। ऐसे उदारचेता गुरु को पाकर किसे धन्यता का अनुभव नहीं होगा। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा में एक बार जब वे व्याख्यान देने आये तो अपने भाषण की कुछ पंक्तियों से मुझे ही चौंका दिया - ''कुछ लोगों को मालूम है पर अधिकतर लोग नहीं जानते। रीवा में मेरी एक बेटी रहती है। मेरा आशय है दिनेश कुशवाह जब तक रीवा में है, एक बेटी के बाप की तरह हर न्योते पर मुझे अपनी तरफ से यथाशक्ति हाजिर होना ही है।'' अब खोज लीजिए देश भर के विश्वविद्यालयों की गुरु-शिष्य परम्परा में ऐसा उदाहरण! कहाँ मिलेगा ऐसा गुरु?

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का मर्तबा किसे नहीं मालूम! जनाब अमीर खुसरो इन्हीं के शागिर्द थे। कहना मुश्किल है कि अमीर खुसरो ने रब को अधिक चाहा था या उस्ताद को। ऐसा गुरु जिसके न रहने पर शिष्य का संसार सूना हो गया। फिर उसके लिए दोनों जहान में कोर्इ रस नहीं रहा।

गोरी सोवे सेज पर, मुँह पर डाले केस।

चल खुसरो घर आपने, रैन भर्इ चहुँ देस।।

खुसरो ने हज़रत को 'गोरी' कहा क्योंकि सूफि़यों की जि़न्दगी का मकसद ही गोरी है। उसी को गाना और उसी को पाना ही सूफि़याना है।


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हिंदी समय में दिनेश कुशवाह की रचनाएँ