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कहानी

चन्द्रावती अथवा नासिकेतोपाख्यान (भाग-1)
सदल मिश्र


सकल सिद्धिदायक वो देवतन में नायक गणपति को प्रणाम करता हूँ कि जिनके चरण कमल के स्मरण किए से विघ्न दूर होता है औ दिन दिन हिय में सुमति उपजती वो संसार में लोग अच्छा अच्छा भोग बिलास कर सबसे धन्य धन्य कहा अन्त में परम-पद को पहुँचते हैं कि जहाँ इन्द्र आदि देवता सब भी जाने को ललचाते हैं।

दोहा

गणपति चरण सरोज द्वौ, सकल सिद्धि की राश ।

बन्दन करि सब होत है, पूरण मन की आश ।।

चित्र विचित्र सुन्दर सुन्दर बड़ी बड़ी अटारिन से इन्द्रपुरी समान शोभायमान, नगर कलिकत्ता महा प्रतापी बीर नृपति कम्पनी महाराज के सदा फूला फला रहे, कि जहां उत्तम उत्तम लोग बसते हैं औ देश देह से एक से एक गुणी जन आय आय अपने अपने गुण को सुफल करि बहुत आनन्द में मगन होते हैं।

नाम सुन सदल मिश्र पण्डित भी वहाँ आन पहुँचा वो बड़ी बड़ाई सुनि सर्वविद्यानिधान ज्ञानवान महा-प्रधान श्री महाराज गिलकृस्त साहब्से मिला कि जो पाठशाला के आचार्य्य हैं। तिनकी आज्ञा पाय दो एक ग्रन्थ संस्कृत से भाषा वो भाषा से संस्कृत किए।

अब संवत १८६० में नासिकेतोपाख्यान को कि, जिसमें चन्द्रावती की कथा कही है, देववाणी से कोई कोई समझ नहीं सकता, इसलिये खड़ी बोली में किया। तहां कथा का आरम्भ इस रीति से हुआ--

एक समय राजा जनमेजय गंगा के तीर पर बारह बरस यज्ञ करने को रहे। एक दिन स्नान पूजा करि ब्राह्मणों को बहुत सा दान दे देवता पितरों को तृप्त करके ऋषि और पण्डितों को साथ लिए वैश्म्पायन मुनि के पास जा, दण्डवत कर, खड़े हो, हाथ जोड़, कहने लगे कि "महाराज ! आप वेद पुराण सब शास्त्र के सार जाननिहार, तिस पर ब्यास मुनि के शिष्य, सब योगियों में इन्द्र समान हो। ऐसी कथा, कि जिसके सुनने से पाप कटे और कोई रोग न होय, भर जन्म संसार में अच्छा भोग,अन्त में मुक्ति मिले, हमसे कहिए।"

प्रसन्न होकर वह बोले कि "हे राजा ! तुम बड़े ज्ञानी हो। अच्छा, सब पाप दूर करने वाली पुराण की कथा कि जिसके सुनने से निस्सन्देह मुक्ति होती है, मैं कहता हूँ, तुम ऋषि वो सेवकों के समेत सावधान होकर सुनो--

किसी समय में ब्रह्मा के पुत्र ऐसे उद्दालक मुनि भए कि जिनके दर्शन से लोग पवित्र होते थे। वेद पुराण श्रुति स्मृति में बहुत निपुण, और दाता दयालु कहिए तो वैसे ही, बड़े समर्थ, सब मुनियों में श्रेष्ठ, कि जिनका तपस्या ही धन था, उनके सुहावने आश्रम पर कि जिसको बड़े-बड़े मुनि लोग नित्य आप सेवैं और जहां नाना प्रकार के वृक्षों पर लता सब छा रही थीं-- पिप्पलाद मुनि आन पहुँचे।

देखते ही उद्दालक ऋषि उठ खड़े भये। सिर नवा, प्रणाम वो जैसा कुछ चाहिए वैसा आदर भाव कर, आसन दे बैठाया। प्रिति से हाथ पांव धोला, कुशल क्षेम वो उनके वहां आवने का कारण पूछा।

वह बोले कि हम तुम्हारी बड़ी तपस्या इस बन में सुनकर आए, जैसे ही तुमको देख बहुत प्रसन्न हुए। पर बिना ब्याह यह तपस्या अकारथ होती है, क्योंकि स्त्री के साथ तप करके ऋषि सब सिद्धि को पंहुचे। और बेद की आज्ञा से सन्तान के लिए पत्नी सों भोग करना उचित है, नहीं वो विस बिन क्या कधी क्रिया सिद्धि होती है। और पुत्रहीन के, देवता वो पितर इन दोनों में कोई सन्तुष्ट नहीं। जग में बिसके देव पितर बहुत आनन्द होते कि जिसको कुल उपजानेवाला पुत्र होता है। वो निपुत्री को घर में क्या सुख कि जिस बिना वह सदा अन्धकार रहता है।

इसलिए हमारी आज्ञा से और सब ऋषियों की सम्मति से किसी से कन्या याचकर अपना बंश उत्पन्न करो, नहीं तो यह तपस्या का परिश्रम तुम्हारा सदा ही व्यर्थ है।

उद्दालक ने उत्तर दिया की प्रभु तप करते हमको छियालीस सहस्र बरस बीते, स्त्री के कारण अब यों उसको त्याग दें तो महा नरक भोग होए। आप बड़े हो जैसी आज्ञा करिए।

हँस के पिप्पलाद ऋषि ने कहा कि तुमको यह कहना उचित नहीं, क्योंकि बिना सन्तान योग तप कबहीं फलदायक नहीं होता है और सन्तति केलिए स्त्री के पास जाने को अगले मुनियों ने भी आज्ञा दी है। तिसमें वह ब्रह्मचारी गिना जाता है कि जो मनुष्य ऋतु समय में उसके पास जाता है। ब्रह्मचर्य ते तप भंग नहींहोता, धर्म्मशास्त्र भी कहता है।

ऐसी सांची सांची बातें कहके मन में वेद के मन्त्र जपते हुए पिप्पलाद मुनि ने फिर निकट समीप जा उद्दालक से कहा कि सन्तति के हेतु भार्य्या के पास जाने से तनिक भी दोष नहीं, आप स्वायंभुव मुनि ने ऎसा कहा है। यह वृत्तान्त वैशम्पायन राजा जनमेजय से कहते हैं।

जब इतना कह पिप्पलाद वहाँ से विदा भए तब उद्दालक चिन्ता करने लगे कि "देखो, हमारी तपस्या में क्या विघ्न आ पड़ा। कहां मेरी बुढ़ापे की अवस्था कि एक भी केश काला नहीं, सो सन्तति के कारण किससे कन्या हम मांगें। कौन उसको देने में प्रसन्न होगा।

ऐसे व्याकुल होकर मन में ठहराया कि अब तो ब्रह्मा के पास चलिए, वेही हमारी अभिलाष को पुरावेंगे।

तब आस पास के ऋषियों से पूछ ब्रह्मा के निकट गए, दूर ही से दण्डवत कर हाथ जोड़ लगे स्तुति करने।

उद्दालक के बचन सुन सन्तुष्ट हो वो ध्यान में जो थे सो आंख खोल पितामह बोले कि "हे ऋषीश्वर ! कुशल से हो ? तुम्हारे आश्रम में मंगल है? और यहाँ आवने का प्रयोजन सुनावो।"

ब्रह्मा की बात सुन उद्दालक ने कहा कि "हां महाराज, आप के अनुग्रह से सब प्रकार से आनन्द है। मुनियों ने हमको पुत्र के लिए विवाह करने की आज्ञा दी है। इसलिए तुम्हारे शरन में आए, हमारा मनोरथ पूरण करिए"।

सुनते ही बिधाता ने कहा कि "पहले तुमको महा तपस्वी कुल उद्धार करने योग्य पुत्र होगा। पीछे राजा इक्ष्वाकु के कुल की महासुन्दरी कन्या वो पतिव्रता सब गुण भरी सो तुम्हारी भार्य्या होगी। चित्त में कुछ चिन्ता मत करो। हमारा कहा कघी झूठ न होगा। अपने आश्रम परजा शिव पूजन करो"।

प्रजापति की बात सुनि चकित हो उद्दालक ने कहा कि "महाराज ! आप बड़े होकर ऐसी मिथ्या बात कहते हो कि जो देखने में आई, न सुनने में। भला, बिना भार्य्या भी किसीको पुत्र होता है?"

उनका यह बचन सुनते ही ब्रह्मा वहां से गुप्त हो गए। तब उद्दालक ने जी में जाना कि विधि का कहा अन्यथा नहीं। इस आस पर वहाँ से ईश्वर का ध्यान करते हुए अपने आश्रम पराअए कि जहाँ चारों ओर ऋषि लोग अपनेजप ध्यान में लगे थे।

राजा जनमेजय से वैशम्पायन कहते हैं कि हे राजा ! यह बहुत अच्छी कथा है इसे कान दे सुनो।

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