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लोककथा

गुठली
तोल्सतोय

अनुवाद - सुकेश साहनी


माँ ने आलूबुखारे खरीदे। सोचा, बच्चों को खाने के बाद दूँगी। आलूबुखारे मेज पर तश्तरी में रखे थे। वान्या ने आलूबुखारे कभी नहीं खाए थे

उसका मन उन्हें देखकर मचल गया। जब कमरे में कोई न था, वह अपने को रोक न सका और एक आलूबुखारा उठाकर खा लिया।खाने के समय माँ ने देखा कि तश्तरी में एक आलूबुखारा कम है। उसने बच्चों के पिता को इस बारे में बताया।

खाते समय पिता ने पूछा, 'बच्चो, तुममें से किसी ने इनमें एक आलूबुखारा तो नहीं लिया?'

सबने एक स्वर में जवाब दिया, 'नहीं।'

वान्या का मुँह लाल हो गया, किंतु फिर भी वह बोला, 'नहीं, मैंने तो नहीं खाया।'

इस पर बच्चों के पिता बोले, 'यदि तुममें से किसी ने आलूबुखारा खाया तो ठीक है, पर एक बात है। मुझे डर है कि तुम्हें आलूबुखारा खाना नहीं आता, आलूबुखारे में एक गुठली होती है। अगर वह गलती से कोई निगल ले तो एक दिन बाद मर जाता है।'

वान्या डर से सफेद पड़ गया। बोला, 'नहीं, मैंने तो गुठली खिड़की के बाहर फेंक दी थी।' सब एक साथ हँस पड़े और वान्या रोने लगा।


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