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कविता

कुछ शेर
शमशेर बहादुर सिंह


[जो एक शादी के मौके के लिए कहे गये]


गुलशन से जो इतराती आँगन में बहार आयी,
खु़शजौक दुल्‍हन उसकी शोखी को सँवार आयी।

यह कौन निगार आया, फिर बाँगे-हजार आयी
कलियों पे निखार आया, फलों पे बहार आयी।

फिर शोरे-अनादिल है, फिर गुंचे परीशाँ हैं :
ए बादे-सबा, लेकर क्‍या नामए-यार आयी?

हर एक शगूफा यह कहता हुआ खिलता है
"शायद कि बहार आयी ! शायद कि बहार आयी !"

(1945)
 

 


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