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कविता

गजल
शमशेर बहादुर सिंह


फिर निगाहों ने तेरी दिल में कहीं चुटकी ली
फिर मेरे दर्द ने पैमाना वफा का बाँधा

और तो कुछ न किया इश्‍क में पड़कर दिल ने
एक इनसान से इनसान वफा का बाँधा

एक फाहा भी मेरे जख्म पे रक्‍खा न गया
और सर पे मेरे एहसान दवा का बाँधा

इस तकल्‍लुफ की मोहब्‍बत थी कि उठते ही बनी
रंग यारों ने वो मेहमानसरा का बाँधा

मौसमे-अब्र में आता है मेरे नाम य हुक्‍म :
कि खबरदार जो तूफान बला का बाँधा !

मुसकराते हुए वह आये मेरी आँखों में -
देखने क्‍या सरोसामान कजा का बाँधा

(1952)

 


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