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कविता

गजल
शमशेर बहादुर सिंह


जहाँ में अब तो जितने रोज
               अपना जीना होना है,
तुम्‍हारी चोटें होनी हैं -
               हमारा सीना होना है।

वो जल्‍वे लोटते फिरते हैं
               खाको-खूने-इंसाँ में :
'तुम्‍हारा तूर पर जाना
                मगर नाबीना होना है!'

कदमरंजा है सूए-बाम
                एक शोखी कयामत की
मेरे खने-हिना-परवर से
                रंगीं जीना होना है!

वो कल आएँगे वादे पर
                मगर कल देखिए कब हो!
गलत फिर, हजरते-दिल
                आपका तख्‍मीना होना है।

बस ऐ शमशेर, चल कर,
                अब कहीं उजलतगजीं हो जा -
कि हर शीशे को महफिल में
                गदाए-मीना होना है।

 


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