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कविता

कुछ शेर
शमशेर बहादुर सिंह


खयाल भी है मेरा जिस्‍म, गो नहीं वह मैं,
य जिंदगी की है इक किस्‍म गो नहीं वह मैं
जो होने-होने को हो, वो मैं हूँ - यकीन करो,
खुदा भी है मेरा ही इस्‍म - गो नहीं वह मैं

 

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खामोशिए-दुआ हूँ, मुझे कुछ खबर नहीं
जाती हैं क्‍या सदाएँ तेरे आस्‍ताँ के पार
सात आसमान झुकके उठाते हैं किसके नाज
किसकी झलक-सी है चमने-कहकशाँ के पार
इतना उदास आपका दिल किस लिए हुआ
हर दर्द की दवा है जमानो मकाँ के पार

 

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इश्‍क की इंतहा तो होती है
दर्द की इंतहा नहीं होती

 

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बंदगी इक मुकाम था, औ वो मुकाम हो चुका
इश्‍क भी नाम था तेरा, औ तेरा नाम हो चुका
आपकी दास्‍तान थी गोया किसी की जिंदगी
आपके आने-जाने तक किस्‍सा तमाम हो चुका
एक खयाले-खाम हूँ, दिल से मुझे भुलाइये
आपको आ चुका हूँ याद, इश्‍क तमाम हो चुका

 

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तू मेरे एकांत का एकांत है
मैं समझता था कि मेरा तू नहीं

 

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कोई तो साथ-साथ मेरी बेखुदी में था
मैं कैसे अपने होश में आया, जवाब दो
उम्‍मीदे-वस्‍ल हो, कि बहाना हयात का
तुम मेरे दिल में हो, मेरे दिल का जवाब दो!

 

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कभी राह में योंहि मिल लेने वाले
बड़े आए हैं मेरा दिल लेने वाले

 

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चुपके-चुपके उनसे मेरी चुगलियाँ खाता रहा
आइने को पहले कितना बेजबाँ समझा था मैं

 

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कितने बादल आये, बरसे और गये
जिनके नीचे मैं पड़ा सुलगा किया!
छुपके बैठे मेरे दिल की चोट में
आपने अच्‍छा किया, पर्दा किया
रुक गये हैं क्‍यों जमीनों-आसमाँ
कुछ कनखियों से इशारा-सा किया

 

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वफा खता थी, खता मैंने जिंदगी-भर की।
अब इसके आगे जो मर्जी हो बंदापरवर की!

 

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इक कलम है और सौ मजमून हैं,
एक कतरा खने-दिल तूफान है।

 

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तुमसे बातें रात-भर करता रहा,
यह न समझा दिल, कोई मेहमान है!

 

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हो चुकी जब खत्‍म अपनी जिंदगी की दास्ताँ
उनकी फर्माइश हुई है, इसको दोबारा कहें

 

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अपनी मिट्टी को छिपाएँ आसमानों में कहाँ
उस गली में भी न जब अपना ठिकाना हो सका!

 

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वो एक शै कि जिसे दर्दे-दिल कहा जाए
गरीब ले के उसी को कहाँ समा जाए!

 

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इल्‍मो-हिकमत, दीनों-ईमाँ, मुल्‍को-दौलत, हुस्‍नो-इश्‍क :
आपको बाजार से जो कहिए ला देता हूँ मैं!

 

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अफसाना वो क्‍या था - मैं भूल गया हूँ।
कहते हैं, कि तू हैं : सुनता है मेरा दिल।

 

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मैं यहाँ तक भूल जाया जा सकूँ
एक आँसू में गिराया जा सकूँ
तुम न ऐसी खाब-सी बातें करो
मैं भला तुमसे निभाया जा सकूँ

 

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आप ही कल मेरा सहारा थे
आपको आज और क्‍या मालूम
आज तू उसके दर पे आ पहुँचा
आज तू अपने दिल का पत्‍थर चूम

 

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मैं कई-बार मिट चुका हूँगा
वर्ना इस जिंदगी की इतनी धूम

 

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जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुजफ्फरनगरी है शायद
आज फिर काम से लौटा हूँ बड़ी रात गये
ताक पर ही मेरे हिस्‍से की धरी है शायद
मेरी बातें भी तुझे खाबे-जवानी-सी हैं
तेरी आँखों में अभी नींद भरी है शायद

 


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