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कविता

जिन्दगी गिरी जैसे बिजली
ओसिप मांदेल्श्ताम


जिन्‍दगी गिरी जैसे गरमियों में बिजली
पानी भरे गिलास में जैसे आँख के कोए।
झूठ बोला, मैं एकदम झूठ
पर दोष इसमें नहीं किसी का।

तुम्‍हें रात का सेब चाहिए क्‍या
रसभरा ताजा अभी-अभी तोड़ा हुआ
कहो तो उतार दूँ अपने ऊनी जूते
उठा दूँ उन्‍हें पंख की तरह ऊपर।

मकड़ी का जाला पहने खड़ा है देवदूत
भेड़ की खाल का सुनहरी कोट लिये
मशाल की रोशनी पहुँच रही है
देवदूत के ऊँचे कंधों तक।

नींद से उठी बिल्‍ली
धारण करती है खरगोश का रूप
अचानक रास्‍ता काटती हुई
गायब हो जाती है दूर कहीं।

काँप रही थी होठों की रसभरी
बेटे को पिलाई जा रही थी चाय
बिना कुछ सोचे-समझे
हो रही थीं बातें अर्थहीन-असंगत।

अचानक बात अधूरी छोड़
वह मुस्‍करा दी झूठ बोलने की तरह
इस तरह कि चमक उठीं
रेखाएँ उसके बदरंग सौंदर्य की।

उद्यानों की हलचल
और आँखों के कोओं के पीछे
एक ऐसा है देश
जहाँ तुम बन सकती हो मेरी पत्‍नी।

चुन कर सूखे ऊन के जूते
सुनहरी कोट भेड़ की खाल का
ले कर हाथ में हाथ
चल देंगे हम दोनों उसी राह पर।

निर्बाध, पीछे देखे बिना
इन चमकते मील पत्‍थरों पर
रात से सुबह तक
पड़ती रहेगी लालटेनों की रोशनी।

 


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