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कविता

बहुत रह लिया उदासी में
ओसिप मांदेल्श्ताम


बहुत रह लिया मैं इस उदासी में,
मेज पर पसार दूँगा कागज,
आज मैं वश में हूँ एक भले प्रेत के।
लगता है जैसे फ्रांसीसी हेअर ड्रेसर ने
शैंपू से जड़ों तक धो डाले हैं मेरे बाल।

मैं अभी मरा नहीं - तैयार हूँ शर्त बदने के लिए,
तैयार हूँ जॉकी की तरह सिर दाँव पर लगाने के लिए,
अब भी रेस कोर्स में दिखा सकता हूँ करतब -
सवार हो सकता हूँ दुलत्‍ती मारते घोड़े पर।

पूरा अहसास है मुझे -
यह वर्ष उन्‍नीस सौ इकतीस है,
चेरी के फूलों में खिल उठा है यह खूबसूरत साल,

प्रौढ़ हो गये हैं बरसात के कीड़े
और पूरा मास्‍को सवार है छोटी-छोटी नावों पर।

उद्विग्‍न होने की जरूरत नहीं
पर ऐयाशी होगा धीरज खोना,
उल्‍लासहीन मैं निकल सकूँगा सड़क पर
बनाये रखूँगा जरूरी फासला।

 


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