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कविता

धूप का सूत
रति सक्सेना


(नन्ही नातिन के लिए)

अचंभित हूँ मैं
कैसे पहचान लेती हो तुम
धुनों को
और उनमें छिपे रस को
मन को और मानस को
शास्त्रीयता के विरुद्ध उगी ध्वनियाँ
तुम्हारे पास जाते ही

कैसे बन जाती है
दूध सी मीठी
कि
झुकने लगती हैं तुम्हारी आँखें
अपने आप
मेरी लोरी को सुन कर

कैसे बुन लेती हो तुम सपने
नींद के शब्दों में
और
कैसे खोज लेती हो
तुम उन अर्थों को
जो उनमें होते ही नहीं

लेकिन बिछे होते हैं
लंबी सुरंग की तरह
भूत के किसी काल तक
जहाँ तुम और मैं
दोनों
एक बिंदु में समाहित थे

अचंभित हूँ मैं!

मैं पढ़ना चाहती हूँ
तुम्हारी पलकों पर
लिखी सपनों की इबारत को
और सीखना चाहती हूँ
उस लिपि को
जो सिंधु घाटी से कहीं पहले
समंदर और पहाड़ों के बीच
नदियों की धाराओं से
लिखी गई हो
मैं रंगना चाहती हूँ
अपने बदरंग तूलिका को
तुम्हारे सपनों के उन रंगो में
जो दरख्तों ने सोख लिए थे आसमान से
धरती पर जन्म लेने से पहले

मैं लिखना चाहती हूँ
उस कविता को
जो तुम्हारे रुदन के भीतरी सुर में
भीगी हुई दीपक बाती की तरह
लहक लहक कर जल रही हो

यह सब करते हुए
जगा लेती हूँ
नाभि की गुहा में छिपे
अनहद नाद को

तुम्हारे रुदन को मैं कात रही हूँ
सूत सा
तुम्हारी मुस्कान को मैं
बुन रही हूँ ताने बाने में

कि तुम्हारे चेहरे में
आ बैठती है माँ

थक कर अपने पैरों को धूप में सुखाती हुई
आँख मूँद कर हिसाब लगाती हुई
सुकून के कुछ पलों का

धूप को उँगलियों में लपेटती हुई
वह कात रही थी कुछ
मैंने उसके चेहरे को हमेशा दूर से ही देखा
बेहद उदासीनता से
एक अजीब सी शत्रुता को पालते हुए
ना उसकी उँगलियों की जकड़न समझ पाई
ना ही घुटनों के दर्द को
कभी नहीं इंतजार किया उसके आलिंगन का

तुम रोते रोते मुस्कुराती हो
मैं तुम्हारे माथे पर चुंबन देती हुई
मानों चूम लेती हूँ माँ
की उँगलियाँ

माँ की अधबुनी चदरिया
चार सीढ़ियाँ उतर कर
मेरी गोदी में
आ बैठती है

मेरी पुरानी अलमारी में से
दो चेहरे निकले हैं
करीब तीस बरस पुराने,
थोड़े मेले जरूर है, पर
कोरापन जस की तस

तुम्हारी माँ उन्हें झाड़ती, पोंछ
सजा सँवार कर
खूँटी पर टाँग देती है
वे खिल उठते हैं
तीस बरस के कारावास से
मुक्ति पा कर

मैं सोचती हूँ, माँ भी ऐसी
मुस्काई होगी
खाट से उठ कर
खूँटी पर टँगते वक्त

तुमने हँसी का प्रतिकार
सीख लिया
मैं दुनिया के सारे कबाड़खानों को
विदा कर देना चाहती हूँ
सारी खूँटियों को उखाड़ फैंकना

जिससे की तुम्हारी मुसकान
सुबह के उजाले सी पसर सके

तुम बढ़ रही हो, बड़ी हो रही हो

 


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