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कविता

बेचैनी उतरती है सूरज पर
वाज़दा ख़ान


चाँद तुम मेरे भीतर सदियों से
ठहरी झील में इठलाने लगे हो

सपने जगाने लगे हो
ये जानते हुए कि तुम्हारा असली घर
आकाश है
झील तो मात्र तुम्हारा प्रतिबिंब है
इसके बावजूद जब तुम हँसते हो
सारी नदियों में एक साथ उफान पर उठती हैं
लहरें अपनी खनक भरी बूँदों के संग
और चाँद जब तुम देखते हो कभी एकटक
डगमगा जाती है पृथ्वी अपनी धुरी पर फिर
चौबीस घंटे में परिक्रमा पूरा करने का क्रम
परिणित हो जाता है अनंत यात्रा में
तुम तक पहुँचने की फिक्र इच्छाएँ और
तीव्रतम ख्वाहिशें रचने लगती हैं अनगिनत शब्द
बनने लगती हैं पंक्तियाँ दर्द होने लगते हैं
उनके मायने धड़कनों में पर कुछ हासिल नहीं
यहाँ तक कि मेरे 'तुम' हो जाने के बाद
मेरे होने का अर्थ भी
इसलिए तुम मुझे उन्हीं तंग गलियारों में
घूमने दो जहाँ सिर्फ बेचैनी उतरती है सूरज पर
गहनतम ध्यान से
तुम्हारे समय को साधने के क्रम में
किसी मुलाकात में
यूँ ही तुम्हारे मुख से निकल गया
और आएँगे जज्बात घूमेगी पृथ्वी
अपनी धुरी पर

बसंत ऋतु ले आएगी
ढेर सारे गुलमोहर के फूल
कई रंगों से रूबरू होगी तुम
कर सकोगी पूरा उन अधूरे रंगों को
जिनकी दरकार तुम्हें
रंगों के साथ रंग बनकर है।

 


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