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कविता

सुर्ख रंगतों की तलाश
वाज़दा ख़ान


हाँ रंगों के बीच रहकर बन जाती हूँ
कोई रंग तो क्या चाँद तुम्हारी
आँखों में कोई तस्वीर नहीं उभरती

क्यूँ नहीं भरते तुम उसमें अपने जज्बात
आखिर तु्म्हें भी अपनी रुहानी रंगों के साथ
सुर्ख रंगतों की तलाश है
तुम भी तो ढूँढ़ना चाहते हो
अपने होने की जड़ें
तभी न तुम अक्सर
अपने आसमान के घर से
इस छोर से उस छोर तक
चुपचाप चक्कर लगाते हो
कभी बादलों के संग टहलते हो
कभी चुपके से झील में उतर आते हो
कभी पत्तियों शाखों टहनियों के पीछे
छुप जाते हो
कभी शुद्ध अवलोकन बन जाते हो
धरती का
आखिर धरती को प्रकाशमान
तुम्हें ही करना है
कहीं कम कहीं ज्यादा।

 


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