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कहानी

रोजा
एम हनीफ मदार


पाक रमजान माह का दसवां रोजा था, मैंने रोजा नहीं रखा था। जबकि मैं जानता था कि दुनिया के हर मुसलमाँ को रोजा रखना फर्ज है। ऐसी धार्मिक मान्यताऐं भी हैं। साल के बारह महीनों में से एक महीना खुदा की इबादत के लिए तया है। इस्लाम में इस महीने को नेकियों का महीना भी कहते हैं। इसलिए रोजे के लिए कुछ सिद्धान्त (उसूल) भी तय हैं उनकी पूर्ति के साथ रोजा रखना ही अल्लाह की सच्ची इबादत है। रोजा रखने के लिए दृढ़ निश्चय करना होता है कि मैं झूठ नहीं बोलूँगा, किसी को गाली नहीं दूँगा, किसी की चुगली या कोई ऐसा काम नहीं करूँगा, जिससे किसी को कोई भी पेरशानी हो, मैं केवल तेरी (खुदा) की इबादत करूँगा। नमाज एवं कुरान पढ़ने के साथ-साथ दुनिया की भलाई को दुआ करूँगा इसके साथ-साथ अपने तमाम शौक जलपान आदि के त्याग का नाम रोजा है।

मैंने एक बार रोजा रखा था। सुबह की नमाज घर पर ही अता की और काम पर आ गया यहाँ आकर मुझे बिजनेस के दृष्टिगत कुछ लोगों से एकदम झूठ बोलना पड़ा, सफेद झूठ। मेरे हृदय से एक आवाज उठी कि तूने रोजा तोड़ दिया और मुझे अपने ऊपर एक बोझ सा प्रतीत होने लगा मैंने अपने को और संयमित किया और रोजा बरकरार रखा अभी दोपहर नहीं हो पाया था कि मेरी जुबान से एक आध भद्दा शब्द भी फिसल गया जो बातचीत के बीच में आजकल हवा में तैरते रहते हैं साँसों के साथ अन्दर जाते हैं और जुबान के द्वारा बाहर आकर फिर हवा में तैरने लगते हैं। ऑफिस में कुछ मित्रों के साथ वार्ता में कुछ अच्छे बुरे विचारों का आदान-प्रदान भी मेरे न चाहते हुए हो गया उन्हें मैं चाहकर भी न रोक पाया क्योंकि वही मेरे मित्र ग्राहक भी थे जिनसे मेरी जीविका चलती है। अतः शाम होते-होते कितनी बार मेरा रोजा खण्डित हुआ। दिनभर की भूख-प्यास से ज्यादा कितनी ही दफा रोजा टूटने एवं खुद एवं खुदा को धोखा देने की टीस ने मुझे तोड़ कर रख दिया। मैंने बुझे मन से रोजा खोला। मुझे लगा कि मैंने रमजान नहीं रखा बल्कि, बहुत बड़ा गुनाह किया है। मैंने रोजा नहीं रखा अपितु दिखावा किया है। रोजे का ढोंग किया है। तबसे मैं रोजा नहीं रखता और तभी से मैंने रमजान में कहीं भी जाना बन्द कर दिया था, क्योंकि बिना रमजान रखे कहीं भी किसी रिश्तेदार के यहाँ जाना मानो पुलिस रिमाण्ड पर जाना हो, यही सुनने को मिलेगा रोजा जरूर रखा करो। खुदा को मत भूलो। हर मुसलमान को रोजा रखना जरूरी है। तुम्हें शर्म नहीं आती, पलभर में चेहरे की हवाइयाँ उड़ा देना बस इसी डर से मैं रमजान के महीने में किसी भी मुस्लिम संबधी के यहाँ नहीं जाता। दुर्भाग्य से उस दिन मुझे किसी अति आवश्यक कार्य से अपनी बहन के यहाँ जाना पड़ा। मैं डरा हुआ सा बस में जा बैठा बस धीर-धीरे स्थान छोड़ गंतव्य की ओेर बढ़ने लगी थी बस के इंजन की आवाज के साथ-साथ मेरा डर भी प्रखर होने लगा था। मुझे डर था रोजा न रखने का और मेरी मंजिल थी दूर शहर के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में मेरी बहन का घर। जबकि अम्मा ने मुझे सुबह सहरी के वक्त जगाया भी था कहा था आज तो रोजा रख ले बहन के यहाँ बिना रोजे से जाएगा तो लोग क्या कहेंगे ''परन्तु उस समय मैंने अम्मा की इस बेहद जरूरी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया था। अब मुझे अपनी मनाही के फैसले पर पश्चाताप भी हो रहा था। काश मैं आज तो रोजा रख ही लेता। गड्ढायुक्त सड़कों पर बस हिचकोले खा रही थी मुझे लगा किसी ने मुझे झकझोर कर कहा है हाँ आज के रोजे से वहाँ झूठा सम्मान तो मिल जाता क्या यह धोखा नहीं होता? मैंने जेब से तम्बाकूयुक्त जर्दा निकाला मुँह में डालता कि पीछे से आवाज उभरी ''भाई साहब बीड़ी मत पीयो मैं रोजे से हूँ" मुझसे तीसरी सीट पर बैठे हुए एक आदमी ने कहा था, बगल में बैठे हुए आदमी से जो बीड़ी पी रहा था सभी यात्रियों का ध्यान बरबस उस व्यक्ति की ओर चला गया जो रोजे से था, मुँह पर गमछा लपेटे हुए उसकी हल्की दाढ़ी के कुछ सफेद काले बाल गमछे से बाहर झाँक रहे थे। उसने बीड़ी फेंक दी और एक अपराधी की भांति सिमट कर बैठ गया, मेरे हाथ से जर्दा का पैकेट भी गिर चुका था, मुझे बस के सभी यात्री मेरी तरफ घूरते से प्रतीत हो रहे थे और जैसे मुझ पर झपटने वाले थे तूने रोजा नहीं रखा। क्यों? तम्बाकू के पैकेट को मैंने जूते से दबाकर छिपा लिया सामने अम्मा खड़ी थी, कहा था कि आज तो रोजा रख ले मैंने अम्मा के साथ खड़े इतने लोगों से नजरे बचाने के लिए अपनी आँखे मूँद लीं और सीट में मानो चिपक कर बैठ गया बस के झटके से मेरी तंद्रा टूटी, बस मेरी मंजिल पर अपने साथियों के बीच खड़ी थी। बैठे यात्री खड़े एक-दूसरे को धकियाते अपनी शीघ्रता का एहसास दिला रहे थे। मैं थके बैल की तरह ऐसा बैठा था, जिसे लाठियों के सहारे उठाया जाता है। दिल बैठा जा रहा था, सामने बहन का घर दिखाई दे रहा था। सहमें कदमों से घर में प्रवेश किया, हृदय में समाए भय का कुछ अंश होठों पर आकर सूख गया था। नैतिक अभिवादन के साथ ही ''आ जाओ क्यों तबियत ठीक नहीं है क्या?" बहन ने हमदर्दी दिखाई और खुद ही जबाब दे दिया ''हाँ, रमजान से होंगे" मैंने संकोच से नहीं में सिर हिला दिया। क्या? मानो बहन को गाली दी हो ''तुम रोजे से नहीं हो तुम तो पढ़े-लिखे हो, यहाँ देखो छोटे बच्चे से लेकर बुड्ढे तक सभी रोजा रखते हैं अभी शाम को देखना घर-घर से सबको बुलाते हुए एक भीड़ के रूप में सभी मस्जिद को जाऐंगे" मैं कुछ बोलता कि वह फिर समझाने लगी ''एक बात बताओ ग्यारह महीने कमाना खाना, भला-बुरा, झूठ-साँच न जाने क्या-क्या करते हैं अमानुष हो जाते हैं कम से कम इसी बहाने एक महीने इन्सान बनकर तो जी लेते हें अपने तमाम गुनाहों से तौबा तो कर लेते हैं तुम तो वह भी नहीं कर रहे हो।" मैं पैरों तले जमीन को पढ़ने की कोशिश कर रहा था इसके बाद हम दोनों घर परिवार की सलाहियत की चर्चा में घंटों व्यतीत करते रहे।

अब तक आसमान में पंछी भी समूह के रूप में अपने घोंसलों में वापस होने लगे थे। धूप पहले ही जा चुकी थी। मैं भी घर को वापस हो लिया, मैं वहाँ पूर्ण संध्या नहीं होने देना चाहता था क्योंकि अब तक मुझमें तमाम रोजेदारों का सामना कर पाने का सहस शेष नहीं रह गया था। मैं गली के नुक्कड़ पर ही था, सामने से भीड़ ने रास्ता बन्द कर रखा था। दो औरतें आपस में लड़ रहीं थीं। कारण जानने की उत्सुकता में मैं भी भीड़ में समा गया, कुछ बच्चे हाथ में प्लेटों में नमकीन कुछ कटे हुए फल लिए खड़े थे जो शायद मस्जिद जा रहे थे रोजा खोलने, गोल टोपी लगाए एक व्यक्ति दूसरे दाढ़ी वाले को बता रहा था ''ये नालायक तो है, जब वह नमाज पढ़ रही थी तो उसे क्या जरूरत थी इतनी तेज आवाज में टेप बजाने की मना किया तो लड़ने लगी। दोनों ओर से भयंकर भद्दी गालियों के बाण चल रहे थे जिन्हें सुन पाना मेरे लिए असंभव हो रहा था। गालियाँ क्या साक्षात अमानवीय अश्लीलता का बखान हो रहा था। दोनों अपने भद्दे शब्दों से एक दूसरी की बेटियों को नंगी कर रही थीं। वे दोनों रोजे से नहीं हैं, मैं इसी भ्रम में रहता यदि उनमें से एक ने न कहा होता... ''मैं रोजे से हूँ, नहीं तो तुझे पैर पर पैर रखकर चीर देती... कुतिया, ... बदजात।" इसलिए तो बची है तू कि मैं रोजे से हूँ नहीं तो... मेरे हाथ-पैर भी टूटे नहीं हैं... छिनाल...।" दूसरे ने पलटवार किया था। मेरा भ्रम टूटा... उन्हें याद था कि वे रोजे से हैं फिर भी झगड़े की पराकाष्ठा चरम छू गई और उन्होंने ''तू ऐसे नहीं मानेगी" कहते हुए अपने-अपने दुपट्टे अपनी लड़कियों को थमाए और एक-दूसरी से दो सांड़ों की भांति भिड़ गईं...। मूकदर्शक बना मुझे लगा उन्होंने, अपना रोजा टूटने के डर से अपने सिर से उतार कर अपनी बेटियों को पकड़ा दिया, जो खड़ी तमाशा देख रही थीं और खुद भिड़ गईं ताकि एक-दूसरे के बाल नोंचने तथा खून बहाने पर भी रोजा न टूटे...। अजान का स्वर गूंजा... भीड़ दौड़ी मानो रेड अलर्ट हुआ हो दोनों ने भी अपना-अपना रोजा सिर पर ओढ़ा ''तुझे रोजा खोलकर देखूँगी" कहती हुई अपने घरों में समा गईं... सन्नाटा... मैं स्तब्ध खड़ा रह गया, मेरा सम्पूर्ण भय न जाने कहाँ काफूर हो गया, सामने अम्मा खड़ी थी, नजरें झुकी, मैंने सगर्व कहा ''इनसे मैं तो फिर भी अच्छा हूँ जो खुद को या खुदा को धोखा नहीं देता।


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