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कविता

बकरे
उमेश चौहान


बकरे ले जाए जा रहे हैं झुंडों में
चरागाहों से गाँव की ओर
दिन भर छककर चराए गए हैं बकरे
ताकि हृष्ट-पुष्ट दिखते रहें वे
जिबह होने तक

बकरे मिमियाते हुए
एक-दूसरे को धकियाते हुए
कतारबद्ध होकर
बढ़े जा रहे हैं आगे
इधर-उधर लपकने की चेष्टा करने पर
चरवाहे की डंडी की तीखी मार झेलते हुए

वे यूँ ही रोज जाते और लौटते हैं
चरागाहों से अपना पेट भरकर
रात का वक्त आते ही
बाड़ों में ठूँस दिए जाने के लिए
बकरों को नहीं मालूम कि
क्यों गायब हो जाता है
उनका कोई न कोई साथी आए दिन
और किसकी थाली में परोसा जाता है
गरम गोश्त का टुकड़ा बना उसका मांस,

बकरों को बस मिमियाना
और चरवाहे की लाठी खाने पर,
सँभलकर,
बस कतार में बँध जाना ही आता है,
प्रतिरोध में सींगें बढ़ाना
या खुरों को पैना करना कतई नहीं आता

पता नहीं बकरों को रात में
अपनी दुर्दशा पर रोना आता है या नहीं
किंतु निश्चित ही बकरों को
गाँधी जी के तीन बंदरों की तरह
आँख, कान, मुँह बंद किए रहना खूब भाता है
भले ही उनके चरागाहों के बगल के जंगल के भेड़िए
उन्हें एक-एक कर चट कर जाएँ
और फिर उनके चरागाहों पर भी
भेड़ियों का ही कब्जा हो जाय

भेड़िओं को न तो घास की कोमलता से मतलब है
न ही बकरों की सेहत से
वे तो चरागाहों को ही अपने कंधों पर उठाए घूमते हैं
और दुनिया के सारे के सारे बकरे
खुद-ब-खुद उनकी झोली में आ गिरते हैं

मौजूदा आर्थिक मंदी के दौर में
जब इन भेड़ियों के कंधों से
फिसलने लगे हैं चरागाह
तो उन्हें दिया जा रहा है
फिर से सँभलकर हमला करने का स्टिमुलस
ताकि इस कठिन दौर में भी
हड़प सकें वे नए-नए चरागाह,
बकरों की माँएँ
आखिर कब तक खैर मनाएँगी मेमनों की!

 


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