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कविता

गठबंधन
उमेश चौहान


प्रजातंत्र की मजबूरी थी
सो बन गया गठबंधन
किस रस्सी से बँधी गाँठ
किस बल से कसा बंधन
इसमें कोई मिथकीय रहस्य न था
बस गठबंधन की घोषित जरूरतों पर
एक अघोषित मतभेद जरूर था

यह गठबंधन
हिंदुस्तानी विवाह-व्यवस्था की तरह
सात जन्मों तक चलते रहने की
अब तक की अघटित परिकल्पना वाला
अथवा जब तक निभे
तभी तक चलने की
पश्चिमी मान्यता वाला भी नहीं था
इसे तो अगले चुनाव तक भी नहीं
बस परिणाम आते ही
और ज्यादा कस जाना
या गाँठ से खुल जाना था
या फिर किसी 'लिव-इन' रिश्ते की तरह
परिणाम आने के बाद ही बनना था
और अगले चुनाव के पहले ही
अलग-अलग हो जाना था

गठबंधन के इसी मर्म को पहचानते हुए
कुछ ने तो परिणाम आने के पहले ही
डाल लिया है अपने कंधे पर
रस्सी का एक छोर
कमर में उसका एक मजबूत फंदा लगाकर
ताकि सरक न पाए उनके कब्जे से
रस्सी का यह छोर कभी
और परिणाम आने पर
बँधवा सकें वे अपने को
किसी भी खूँटे से
लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर

बलिहारी इन गठजोड़ों की
बेवकूफी हम करोड़ों की।

 


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